पानीपत का 'मनाणा' गांव: खो-खो की बदौलत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान

पानीपत के मनाणा गांव की बेटियों ने खो-खो में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया। खेल के दम पर पाई सरकारी नौकरी, जानें कैसे बदला इस गांव का भविष्य।

 
बेटियों की खेल उपलब्धि

पानीपत: हरियाणा की उपजाऊ धरती अब केवल खेती-किसानी के लिए ही नहीं, बल्कि खेलों में भी नई पहचान बना रही है. पानीपत जिले के समालखा ब्लॉक का छोटा-सा गांव मनाणा आज खो-खो की बदौलत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान स्थापित कर चुका है. कभी जहां बेटियों के खेल मैदान में उतरने पर संकोच होता था, वहीं आज इसी गांव की बेटियां भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं और सरकारी नौकरियां हासिल कर रही हैं.

सोच बदली तो बदल गई गांव की तस्वीर: मनाणा में खेलों की यह क्रांति तत्कालीन सरकारी स्कूल की प्रधानाचार्या सरिता की पहल से शुरू हुई. उन्होंने ग्रामीणों को समझाया कि बेटियां भी खेलों में भविष्य बना सकती हैं. इसके बाद खो-खो कोच रविंद्र सैनी और उनके गुरु स्वर्गीय रामस्वरूप राठी ने गांव में प्रतिभाओं को तराशने का बीड़ा उठाया. धीरे-धीरे गांव का माहौल बदला और खेल गांव की नई पहचान बन गया.

मुकेश ने दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान: गांव की बेटी मुकेश ने साल 2010 में खो-खो खेलना शुरू किया. मेहनत के दम पर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक अपनी जगह बनाई. वर्ष 2016 की साउथ एशियन प्रतियोगिता और वर्ष 2019 में नेपाल के काठमांडू में आयोजित साउथ एशियन खो-खो चैंपियनशिप में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया. अब तक वह 26 राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर कई पदक जीत चुकी हैं. वर्ष 2026 में उनकी नियुक्ति जूनियर कोच के पद पर हुई और अब वह नई पीढ़ी को प्रशिक्षण दे रही हैं. अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी मुकेश ने कहा कि, "मेरा सपना है कि मनाणा की अधिक से अधिक बेटियां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलें तथा देश और प्रदेश का नाम रोशन करें."

कोच रविंद्र सैनी ने तैयार किए सैकड़ों खिलाड़ी: वहीं, खो-खो कोच रविंद्र सैनी वर्ष 2010 से गांव के लड़के और लड़कियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं. उनके मार्गदर्शन में मनाणा आज प्रदेश का प्रमुख खो-खो गांव बन चुका है. गांव के अधिकांश परिवार किसी न किसी खिलाड़ी से जुड़े हैं और कई युवाओं ने खेल के दम पर सरकारी नौकरी भी हासिल की है. कोच रविंद्र सैनी ने कहा कि, "आज मनाणा के करीब 90 प्रतिशत घरों में खो-खो खिलाड़ी हैं. लगभग 100 से 150 खिलाड़ी नियमित अभ्यास करते हैं और 20 से 25 खिलाड़ी सरकारी नौकरियां हासिल कर चुके हैं. बच्चों को रोज सुबह 5 से 7 बजे और शाम 5 से 8 बजे तक प्रशिक्षण दिया जाता है. सरकार की ओर से गांव में लड़कों और लड़कियों की अलग-अलग खेल नर्सरियां भी संचालित हैं, जिससे खिलाड़ियों को डाइट सहायता मिलती है."

सविता ने खेल के दम पर पाई सरकारी नौकरी: मनाणा की खिलाड़ी सविता ने भी साल 2010 में खो-खो खेलना शुरू किया. वह 10 से 15 राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर कई पदक जीत चुकी हैं. साल 2022 में उनकी सरकारी नौकरी लगी और वर्तमान में वह लोक निर्माण विभाग (PWD B&R) में कार्यरत हैं. खिलाड़ी सविता ने कहा कि, "गांव में खो-खो की परंपरा लगातार मजबूत हो रही है. नई पीढ़ी बड़े खिलाड़ियों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ रही है और भविष्य में और भी अच्छे परिणाम आएंगे."

अक्षरा और अवनी जैसे खिलाड़ी बढ़ा रहे उम्मीदें: वहीं, 11वीं कक्षा की छात्रा अक्षरा अब तक सात राष्ट्रीय और आठ राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं. वह कोच रविंद्र सैनी और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी मुकेश को अपनी प्रेरणा मानती हैं. वहीं, 10 वर्षीय अवनी रोज सुबह-शाम नियमित अभ्यास करती हैं और भविष्य में भारत के लिए पदक जीतने का सपना संजोए हुए हैं.

खेल बना गांव की नई पहचान: बता दें कि पानीपत के गांव मनाणा की कहानी केवल एक गांव की सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की मिसाल भी है. जहां कभी बेटियों के खेल पर सवाल उठते थे, वहीं आज खेल गांव की पहचान बन चुका है. खेती की मिट्टी अब खिलाड़ियों के पसीने से भी सींची जा रही है और यही मेहनत मनाणा को विश्व पटल पर नई पहचान दिला रही है.