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US Payroll and AI Impact on Jobs: अमेरिकी कंपनियों में नई भर्तियों में 60 फीसदी की भारी गिरावट, जानिए क्या है इसके पीछे की वजह

अमेरिका में बेरोजगारी दर कम होने के बावजूद नई नौकरियां मिलना बेहद कठिन हो गया है। इसे 'नो हायर, नो फायर' का दौर कहा जा रहा है।
 

अमेरिका की इकोनॉमी को लेकर आ रहे आंकड़े एक अजीब पहेली खड़ी कर रहे हैं. बेरोजगारी दर सिर्फ 4.1% है, जो ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो कोई खराब आंकड़ा नहीं है. न ही कंपनियां बड़े पैमाने पर छंटनी कर रही हैं. यानी ऊपर से देखें तो जॉब मार्केट स्थिर नजर आता है. इसी तस्वीर के पीछे एक दूसरी हकीकत छिपी है. नई नौकरियां मिलना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है. जो लोग नौकरी की तलाश में हैं, वे महीनों तक इंटरव्यू देते रहते हैं, लेकिन ऑफर लेटर आने का नाम नहीं ले रहा. अर्थशास्त्रियों ने इस अजीब हालात को No Hire, No Fire यानी न भर्ती, न छंटनी का नाम दिया है. साल 2023-24 के मुकाबले जून 2026 तक भर्ती में करीब 60 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. आखिर अमेरिका की इकोनॉमी इस अनोखे दौर में कैसे पहुंची, इसे समझने के लिए हालिया डेटा और रिपोर्ट्स पर एक नजर डालना जरूरी है.

भर्तियों की रफ्तार में भारी गिरावट

सबसे बड़ा संकेत खुद पेरोल यानी कंपनियों की वेतनसूची के आंकड़ों में छिपा है. 2026 में अब तक अमेरिकी कंपनियों ने औसतन करीब 61 हजार नौकरियां हर महीने जोड़ी हैं. यह आंकड़ा 2023-24 के दौरान के औसत करीब 1.66 लाख मासिक नौकरियों की तुलना में काफी कम है. हालात तब और गंभीर दिखते हैं जब जुलाई के आंकड़े सामने आते हैं. अमेरिकी कंपनियों ने कुल मिलाकर करीब 23 हजार नौकरियां घटा दीं. यानी सिर्फ भर्ती धीमी नहीं हुई, बल्कि कुछ महीनों में नौकरियों की संख्या में सीधी कमी भी दर्ज हुई. BLS के मुताबिक जुलाई में कुल नॉनफार्म पेरोल रोजगार 23 हजार घटा और बेरोजगारी दर 4.1% रही.

इंडीड हायरिंग लैब की अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक जून में हायरिंग रेट सिर्फ 3.4%, क्विट्स रेट महज 2% और लेऑफ रेट केवल 1.1% रहा यानी तीनों ही आंकड़े काफी दबे हुए हैं. जॉब पोस्टिंग इंडेक्स भी महामारी से पहले के स्तर के आसपास ही ठहरा हुआ है. जानकारों का कहना है कि यह सुस्ती किसी एक महीने की बात नहीं, बल्कि पिछले करीब डेढ़ साल से चली आ रही एक बड़ी ट्रेंड का हिस्सा है, जिसमें भर्ती की रफ्तार धीरे-धीरे और सुस्त होती चली गई है.

आखिर कंपनियां नई भर्ती से बच क्यों रही हैं?

इस सुस्ती के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं. सबसे बड़ी वजह है आर्थिक अनिश्चितता यानी आगे क्या होगा, इसे लेकर कंपनियों में साफ तस्वीर नहीं है. ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीतियों ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है और आगे की प्लानिंग करना मुश्किल कर दिया है. इसके अलावा तेल की ऊंची कीमतों और दुनिया में बढ़ते तनाव ने भी कारोबार की लागत पर दबाव डाला है. जब भविष्य को लेकर क्लियरिटी नहीं होती, तो कंपनियां नए कर्मचारियों पर खर्च बढ़ाने के बजाय फिलहाल इंतजार करने का रास्ता चुनती हैं.

इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का असर भी अब साफ दिखने लगा है. कई कंपनियां ऐसे कामों के लिए जो पहले नए कर्मचारियों से करवाए जाते थे, अब AI टूल्स का इस्तेमाल कर रही हैं. इससे कुछ तरह की नौकरियों में नई भर्ती की जरूरत घट गई है. पेरोल फर्म ADP के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में निजी क्षेत्र में सिर्फ 44 हजार नौकरियां जुड़ीं. वहीं, नौकरी बदलने वालों की सैलरी ग्रोथ करीब 7% तक पहुंच गई, जो करीब एक साल में सबसे तेज रफ्तार रही. यानी जो कुशल लोग नौकरी बदल पा रहे हैं, उन्हें अच्छा पैसा मिल रहा है, लेकिन नई एंट्री बेहद सीमित है.

तो फिर छंटनी क्यों नहीं हो रही?

यह सवाल इस पूरी पहेली का सबसे दिलचस्प हिस्सा है. अगर भर्ती इतनी धीमी है, तो कंपनियां कर्मचारियों को निकाल क्यों नहीं रहीं? इसका जवाब कोरोना महामारी के बाद के अनुभव में छिपा है. उस दौर में जब मांग अचानक बढ़ी थी, तो जिन कंपनियों ने बड़े पैमाने पर छंटनी की थी, उन्हें दोबारा भर्ती करने में काफी मुश्किल और खर्च झेलना पड़ा था. इस अनुभव से सीख लेते हुए अब कंपनियां जोखिम नहीं लेना चाहतीं. इसके बजाय वे भर्ती पर रोक, काम के घंटों में कटौती और अस्थायी स्टाफ में कमी जैसे छोटे कदमों से काम चला रही हैं.

साप्ताहिक बेरोजगारी दावे भी 2026 में ज्यादातर समय 2 लाख के आसपास ही बने रहे हैं, जो बताता है कि छंटनी का माहौल फिलहाल ज्यादा तेज नहीं है. यानी कंपनियां न तो जरूरत से ज्यादा स्टाफ रखना चाहती हैं और न ही मौजूदा टीम को घटाकर भविष्य में मुश्किल में पड़ना चाहती हैं. यही सतर्क रवैया No Hire, No Fire की स्थिति को जन्म देता है. एक ऐसा जॉब मार्केट जो देखने में स्थिर लगता है, लेकिन अंदर से लगभग रुका हुआ है.

नौकरी तलाशने वालों के लिए क्या मतलब?

इस पूरे हालात का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो नई नौकरी की तलाश में हैं, खासकर फ्रेशर्स और करियर बदलने की सोच रहे लोगों पर. भले ही हेडलाइन बेरोजगारी दर कम दिखे, लेकिन जब भर्तियां ही सीमित हों, तो नौकरी खोजने में लगने वाला समय बढ़ जाता है और सैलरी को लेकर मोलभाव करने की ताकत भी घट जाती है. BLS के जुलाई के आंकड़ों के मुताबिक 27 हफ्ते या उससे ज्यादा समय से बेरोजगार लोगों की संख्या करीब 18 लाख रही और कुल बेरोजगारों में उनकी हिस्सेदारी 25.5% थी.

इंडीड हायरिंग लैब के विश्लेषकों का कहना है कि यह ठहराव जल्दी टूटने वाला नहीं है, क्योंकि कंपनियां टैरिफ, महंगाई और दुनिया में चल रही अनिश्चितता के बीच हर नई भर्ती को बहुत सोच-समझकर देख रही हैं. कुल मिलाकर तस्वीर यह बनती है कि अमेरिकी जॉब मार्केट फिलहाल न तो तेजी से गिर रहा है और न ही आगे बढ़ रहा है. यह एक तरह के ठहराव में फंसा है, जहां न तो नई नौकरियां आसानी से मिल रही हैं और न ही पुरानी नौकरियां बड़े पैमाने पर जा रही हैं. आने वाले महीनों में फेडरल रिजर्व की नीतियां, टैरिफ पर क्लियरिटी और AI का बढ़ता इस्तेमाल यह तय करेगा कि यह फ्रोजन लैंडस्केप कब और कैसे पिघलता है.