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Haryana Nuh Government School News: बिजली के खंभे और खेतों की संकरी मेढ़ बनी बच्चों की राह, नूंह में स्कूल के पक्के रास्ते की मांग

नूंह जिले के फलेंडी गांव में सरकारी स्कूल तक जाने के लिए पक्का रास्ता न होने से मासूम बच्चे जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। जानिए पूरा मामला।
 

नूंह: जिले के फलेंडी गांव में सरकारी स्कूल तक पहुंचने वाले मासूम विद्यार्थियों की राह बेहद जोखिम भरी बनी हुई है. स्कूल तक न तो कोई पक्का सरकारी रास्ता है और न ही सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था. बच्चों को पहले नाले पर रखे बिजली के खंभों के सहारे गुजरना पड़ता है और इसके बाद खेतों की संकरी मेढ़ से होकर स्कूल पहुंचना पड़ता है.

बरसात में बढ़ जाता है खतरा: बारिश के दिनों में बच्चों की परेशानी और बढ़ जाती है. खेतों की मेढ़ पर पानी और कीचड़ जमा होने से फिसलने का खतरा बना रहता है. कई बार बच्चे स्कूल पहुंचने के बजाय रास्ते से ही वापस घर लौटने को मजबूर हो जाते हैं. विद्यार्थियों के अनुसार स्कूल ड्रेस में इस रास्ते से गुजरना भी चुनौतीपूर्ण है.

बच्चों को पढ़ाई से ज्यादा रास्ते की चिंता: विद्यार्थियों का कहना है कि रास्ते में फिसलने और कपड़े खराब होने का डर बना रहता है. कीचड़ लगे कपड़ों के साथ घर लौटने पर उन्हें अभिभावकों की नाराजगी भी झेलनी पड़ती है. पढ़ाई की इच्छा के बावजूद सुरक्षित रास्ते का अभाव उनके लिए बड़ी परेशानी बना हुआ है. एक छात्र तोहिद ने कहा कि, "बारिश में खेत की मेढ़ पर पानी और कीचड़ भर जाता है. स्कूल जाते समय गिरने और कपड़े खराब होने का डर रहता है." वहीं, एक अन्य छात्र राहुल का कहना है कि, "स्कूल तक जाने के लिए सुरक्षित रास्ता नहीं है. बरसात में रास्ता और मुश्किल हो जाता है, इसलिए कई बार स्कूल पहुंचना कठिन हो जाता है."

शिक्षक और मिड-डे मील कर्मचारी भी परेशान: ग्रामीणों की मानें तो ये समस्या बच्चों की ही नहीं, बल्कि हर किसी की है. ग्रामीण इदरिश बोहरा, कादिर खान, मकसूद खान, शाहिद खान और वाहिद खान ने बताया कि समस्या सिर्फ विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है. शिक्षक और मिड-डे मील तैयार करने वाले कर्मचारी भी रोज इसी रास्ते से गुजरते हैं. दूसरे गांव से मिड-डे मील का राशन खेतों की मेढ़ से सिर पर उठाकर स्कूल तक पहुंचाना पड़ता है.

"दाखिलों पर पड़ रहा असर": वहीं, सरकारी मिडिल स्कूल के अध्यापकों का कहना है कि स्कूल तक अधिकृत रास्ता नहीं होने का सीधा असर विद्यार्थियों के दाखिले और नियमित उपस्थिति पर पड़ रहा है. पिछले वर्ष सरकारी प्राइमरी स्कूल में 340 विद्यार्थी नामांकित थे, जबकि अब यह संख्या घटकर 280 रह गई है. मिडिल स्कूल में फिलहाल करीब 140 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं. अध्यापक राजेश कुमार का कहना है कि, "स्कूल तक कोई अधिकृत रास्ता नहीं होने से विद्यार्थियों के दाखिले और नियमित उपस्थिति पर असर पड़ रहा है. पक्का रास्ता बनने से स्थिति में सुधार आएगा." वहीं, अध्यापक अनूप सिंह का कहना है कि, "बच्चों और स्टाफ को रोज कठिन रास्ते से स्कूल पहुंचना पड़ता है. सुरक्षित रास्ता मिलने से विद्यार्थियों की उपस्थिति बढ़ सकती है." इसके अलावा अध्यापक वाहीद अहमद ने कहा कि, "स्कूल तक सुरक्षित रास्ता होना बहुत जरूरी है. इससे बच्चों की पढ़ाई और स्कूल की व्यवस्था दोनों बेहतर होंगी."

डीसी के रात्रि विश्राम कार्यक्रम में भी उठी थी मांग: ग्रामीणों ने बताया कि इस गंभीर समस्या को स्कूल प्रांगण में जिला उपायुक्त के रात्रि विश्राम कार्यक्रम के दौरान भी उठाया गया था. उस समय अधिकारियों ने जल्द समाधान का भरोसा दिया था. इसके बावजूद कई महीने गुजरने के बाद भी रास्ते को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

फिरनी की पैमाइश से जगी थी उम्मीद: हाल ही में गांव की फिरनी की पैमाइश की गई, जिसके बाद ग्रामीणों को उम्मीद जगी कि स्कूल तक रास्ते की समस्या का भी समाधान होगा. हालांकि अब तक इस दिशा में कोई स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी है. ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन को मामले में जल्द कार्रवाई करनी चाहिए.

280 बच्चों के लिए सुरक्षित रास्ते की मांग: ग्रामीणों ने प्रशासन से स्कूल तक पक्का और अधिकृत रास्ता बनाने की मांग की है. उनका कहना है कि शिक्षा के लिए स्कूल जाने वाले बच्चों को इस तरह जोखिम उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. यदि सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराया जाता है तो विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति बढ़ने के साथ शिक्षा व्यवस्था में भी सुधार की उम्मीद है.