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Priyadarshan Haivan Thriller: 'ओप्पम' की रीमेक हैवान क्यों नहीं दोहरा पाई जादू? जानिए फिल्म के 5 सबसे बड़े माइनस पॉइंट

अक्षय कुमार और सैफ अली खान की फिल्म 'हैवान' रिलीज। जानिए क्यों कमजोर स्क्रीनप्ले और सस्पेंस की कमी से उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी फिल्म।
 

सिनेमाघरों की टिकट खिड़की पर जब दो ऐसे सितारों के नाम की तख्ती लगती है जिन्होंने 90 के दशक से दर्शकों के दिलों पर राज किया हो, तो थिएटर के बाहर लगने वाली कतारें स्वाभाविक हैं. अक्षय कुमार और सैफ अली खान की जोड़ी पूरे 18 साल बाद जब डायरेक्टर प्रियदर्शन के साथ क्राइम-थ्रिलर ‘हैवान’ लेकर आई, हर कोई एक्साइटेड था. एक तरफ मर्डर मिस्ट्री का गहरा सस्पेंस और दूसरी तरफ दो मंझे हुए कलाकारों का स्टारडम. लेकिन पहले दिन का पहला शो खत्म होते-होते सिनेमाघरों से जो सुर निकलकर सामने आए हैं, वे यह साफ इशारा कर रहे हैं कि सिर्फ बड़े नामों का होना किसी फिल्म के ब्लॉकबस्टर होने की गारंटी नहीं होता.

सैफ अली खान ने एक दृष्टिहीन (ब्लाइंड) किरदार के जरिए अपने एक्टिंग के दायरे को जरूर बढ़ाया है और अक्षय कुमार का इंटेंस मिजाज भी स्क्रीन पर वजन डालता है. इसके बावजूद, ये थ्रिलर फिल्म उस ऊंचाई को छूने से कतराती दिखी जिसका वादा इसके टीज़र और ट्रेलर में नजर आ रहा था. आइए बात करते हैं, वे कौन से 5 मोर्चे हैं जहां ‘हैवान’ दर्शकों की भारी-भरकम उम्मीदों से थोड़ी पीछे छूट गई?

1. ओरिजिनल ‘ओप्पम’ के सस्पेंस और थ्रिल की कमी

ये बात किसी से छिपी नहीं है कि ये फिल्म 2016 की मलयालम सुपरहिट ‘ओप्पम’ का आधिकारिक रूपांतरण है. आज का दर्शक ओटीटी और सबटाइटल्स के दौर में इतना आगे निकल चुका है कि वो ओरिजिनल के एक-एक ट्विस्ट से पहले ही वाकिफ है. मोहनलाल ने उस किरदार में जो ठहराव, डर और मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा किया था, वो ‘हैवान’ में थोड़ा लाउड और ड्रामैटिक हो गया. जब कहानी की मुख्य पहेली पहले से सुलझी हुई हो, तो रीमेक को तकनीकी और इमोशनल रूप से ओरिजिनल से दो कदम आगे होना पड़ता है, लेकिन यहां ओरिजिनल वाला सांस रोक देने वाला थ्रिल नदारद दिखा.

2. सुस्त शुरुआत और पहले हाफ की धीमी रफ्तार

किसी भी मर्डर मिस्ट्री की जान उसकी चुस्त रफ्तार होती है, जहां हर बीतता मिनट दर्शक की सांस अटकाए रखे. ‘हैवान’ में दिक्कत ये हुई कि फिल्म के पहले भाग में माहौल बनाने और किरदारों का बैकग्राउंड सेट करने में जरूरत से ज्यादा वक्त जाया कर दिया गया. शुरुआत इतनी धीमी है कि जब तक मुख्य मर्डर और साजिशों का जाल बुनना शुरू होता है, तब तक दर्शक सीट पर थोड़े असहज होने लगते हैं. थ्रिलर में ये ‘ढीली शुरुआत’ फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई.

3. डर की जगह हंसी छोड़ जाते हैं कुछ दृश्य

प्रियदर्शन की सबसे बड़ी ताकत कॉमेडी रही है, लेकिन एक डार्क क्राइम-थ्रिलर में यही आदत भारी पड़ गई. मर्डर-मिस्ट्री में जहां हर फ्रेम में खौफ और सिहरन महसूस होनी चाहिए थी, वहां कुछ सीन ऐसे आ गए जो थ्रिल का मूड ही बिगाड़ देते हैं. उदाहरण के तौर पर, सस्पेंस के बीच अचानक अक्षय कुमार का नर्स के गेटअप में आना डर पैदा करने के बजाय थिएटर में हंसी छोड़ जाता है. ऐसे कॉमिक और अजीबोगरीब सीन्स ने फिल्म की संजीदगी और डर के माहौल को बुरी तरह पंचर कर दिया.

4. अक्षय और सैफ के बीच फेस-ऑफ की भारी कमी

दर्शक थिएटर्स में अक्षय और सैफ को सिर्फ एक ही फिल्म का हिस्सा बनते देखने नहीं आए थे, बल्कि उनके बीच एक हाई-वोल्टेज या सीधा टकराव देखना चाहते थे. स्क्रीनप्ले की लिखावट ऐसी रही कि दोनों दिग्गज अपने-अपने ट्रैक्स पर अलग-अलग दौड़ते नजर आए. उनके बीच आमने-सामने के वो धड़कनें तेज कर देने वाले ‘फेस-ऑफ’ सीन्स बहुत कम थे, जिनकी उम्मीद में दर्शक टिकट लेकर पहुंचे थे. जब दो पावरहाउस एक्टर्स सामने हों और स्क्रीन पर उनका सीधा टकराव ही न दिखे, तो निराशा होना स्वाभाविक है.

5. बैकग्राउंड स्कोर का असरहीन होना

थ्रिलर फिल्मों की रीढ़ उसका बैकग्राउंड म्यूजिक होता है, जो स्क्रीन पर साया भी दिखे तो रोंगटे खड़े कर दे. ‘हैवान’ का साउंड डिजाइन उस खौफनाक तनाव को बिल्ड करने में पूरी तरह नाकाम रहा. म्यूजिक में वो धार और वजन ही नहीं था जो थ्रिल को नई ऊंचाई दे सके. यही वजह है, कई अहम मोड़ और क्लाइमेक्स के दृश्य जितने असरदार और झकझोर देने वाले होने चाहिए थे, कमजोर बीजीएम की वजह से बिल्कुल सपाट होकर रह गए.

कुल मिलाकर, ‘हैवान’ एक अच्छी कोशिश बनकर रह गई. अक्षय कुमार का संजीदा अंदाज अपनी जगह ठीक है, लेकिन स्क्रीनप्ले की ये ढील, कमजोर थ्रिल और बेमेल सीन्स फिल्म को एक ‘यादगार थ्रिलर’ बनने की रेस से बाहर कर देते हैं.