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अनिल विज का 14 साल का 'राजनीतिक वनवास' और 7 बार विधायक बनने की पूरी अनकही कहानी

हरियाणा के पूर्व कैबिनेट मंत्री और अंबाला छावनी से 7 बार विधायक अनिल विज के राजनीतिक सफर, संघ के प्रति निष्ठा और 14 साल के 'राजनीतिक वनवास' की पूरी अनकही कहानी।

 

चंडीगढ : हरियाणा की राजनीति में यदि किसी नेता को बेबाक, स्पष्टवादी और संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता है तो वह नाम है अनिल विज। अंबाला छावनी से लगातार सातवीं बार विधायक चुने गए अनिल विज भाजपा की उन चुनिंदा हस्तियों में हैं, जिन्होंने संगठन और विचारधारा के प्रति अपनी निष्ठा को कभी सत्ता से ऊपर रखा। हरियाणा में भाजपा की अपने दम पर बनी तीनों सरकारों में वह कैबिनेट मंत्री रहे हैं और गृह, स्वास्थ्य तथा तकनीकी शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।

लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा जितनी सफल दिखाई देती है, उसके पीछे उतना ही लंबा संघर्ष छिपा है। स्वयं अनिल विज कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि उन्होंने भगवान राम की तरह 14 वर्ष का राजनीतिक वनवास झेला। उनका कहना है कि वह पूरी तरह निर्दोष थे, फिर भी संघ के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने बिना कोई सवाल उठाए उसे स्वीकार किया।

छात्र जीवन में संघ से जुड़ाव, वहीं से शुरू हुआ सार्वजनिक जीवन

अनिल विज का सार्वजनिक जीवन छात्र राजनीति से शुरू हुआ। वर्ष 1969-70 के दौरान करनाल के तत्कालीन संघ संचालक प्रो. गोपाल कृष्ण के संपर्क में आने के बाद वह पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में पहुंचे। उनकी कार्यशैली और समर्पण को देखते हुए उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जिम्मेदारी सौंपी गई।
इसके बाद वह हिंदू परिषद, भारत विकास परिषद, भारतीय मजदूर संघ और जनसंघ की गतिविधियों में सक्रिय हो गए। 1974 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी मिलने के बाद भी उनका सामाजिक और संगठनात्मक जीवन नहीं रुका। बैंक से छुट्टियां लेकर वह संघ और जनसंघ के कार्यक्रमों में भाग लेते रहे और बिना किसी पद की इच्छा के संगठन द्वारा सौंपे गए हर दायित्व को निभाते रहे।

नौकरी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन संघ का आदेश सर्वोपरि रहा
आपातकाल के बाद हुए चुनावों में उन्होंने पार्टी उम्मीदवारों के लिए पूरी निष्ठा से काम किया। 1987 में अंबाला छावनी से सुषमा स्वराज के चुनाव अभियान में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
1990 में जब सुषमा स्वराज राज्यसभा चली गईं और अंबाला छावनी सीट पर उपचुनाव घोषित हुआ तो पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने अनिल विज को चुनाव लड़ने के लिए कहा। लेकिन उस समय वह स्टेट बैंक में लगभग 17 वर्ष की नौकरी कर चुके थे और पेंशन के पात्र बनने वाले थे। इसलिए उन्होंने साफ मना कर दिया।
बताया जाता है कि दिल्ली और हरियाणा के कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन वह तैयार नहीं हुए। आखिरकार रोहतक में संघ और जनसंघ के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में एक वरिष्ठ संघ अधिकारी ने उनसे कहा—"बहुत सुन ली तुम्हारी बातें, सुबह बैंक से इस्तीफा देकर चुनाव लड़ो।"
अनिल विज के अनुसार, वह संघ के उस आदेश को टाल नहीं सके। अगले ही दिन उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़ दी और पहली बार विधानसभा चुनाव के मैदान में उतर गए।

पहले ही चुनाव में बनाया रिकॉर्ड
उस समय प्रदेश का माहौल महम कांड के बाद तनावपूर्ण था। आम धारणा थी कि उपचुनाव केवल सत्ता पक्ष ही जीत सकता है। लेकिन अनिल विज ने यह धारणा तोड़ते हुए अंबाला छावनी से जीत दर्ज की और अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित की। हालांकि नौ महीने बाद हुए आम चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन संगठन में उनकी सक्रियता लगातार बढ़ती गई। उनकी निष्ठा और मेहनत को देखते हुए भाजपा ने उन्हें युवा मोर्चा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंपी।

1995 में अचानक आया राजनीतिक झटका
अनिल विज के राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन दौर 1995 में शुरू हुआ। उनके अनुसार, संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें बुलाकर पार्टी से इस्तीफा देने के लिए कहा। उन्होंने कारण जानना चाहा, लेकिन कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। विज का कहना है कि उन्होंने केवल इतना कहा था कि पहले नौकरी छुड़वाई गई और अब पार्टी भी छोड़ने के लिए कहा जा रहा है। इसके बावजूद उन्होंने संगठन के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए उसी समय अपना इस्तीफा सौंप दिया। यहीं से उनके जीवन का वह दौर शुरू हुआ, जिसे वह 14 वर्ष का राजनीतिक वनवास कहते हैं।

निर्दलीय बने, लेकिन विचारधारा नहीं बदली
पार्टी से अलग होने के बाद भी अनिल विज ने भाजपा या संघ के खिलाफ कोई अभियान नहीं चलाया। 1996 में जनता और समर्थकों के दबाव पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। निर्दलीय विधायक बनने के बावजूद उन्होंने कभी किसी दूसरी पार्टी की सदस्यता स्वीकार नहीं की। उस समय मुख्यमंत्री बंसीलाल ने उन्हें मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया।

वर्ष 2000 में जब ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व में इनेलो सरकार बनी तो उन्हें पार्टी में शामिल कराने के लिए वरिष्ठ नेताओं अशोक अरोड़ा और ओमप्रकाश महाजन को जिम्मेदारी दी गई। बताया जाता है कि ओमप्रकाश महाजन दो दिन तक उनके निवास पर रहे और मंत्री पद का प्रस्ताव भी रखा गया, लेकिन अनिल विज ने विचारधारा से समझौता करने से इनकार कर दिया।

14 साल बाद सम्मानपूर्वक हुई भाजपा में वापसी
लगातार 14 वर्षों तक पार्टी से बाहर रहने के बावजूद अनिल विज ने भाजपा और संघ के खिलाफ कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की। उनका कहना था कि जब तक उन्हें बाहर किए जाने का कारण नहीं बताया जाएगा, वह स्वयं वापसी की पहल नहीं करेंगे। आखिरकार वर्ष 2009 में तत्कालीन हरियाणा प्रभारी विजय गोयल ने उनकी सम्मानजनक वापसी सुनिश्चित की। दिलचस्प बात यह रही कि उन्हें पहले टिकट मिलने की खबर टीवी चैनलों पर दिखाई गई और बाद में औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता दिलाई गई। स्वयं अनिल विज ने कई बार इस घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि टिकट की घोषणा के बाद ही उन्हें पार्टी का सदस्य बनाया गया।

सात बार विधायक, तीन सरकारों में कैबिनेट मंत्री
भाजपा में वापसी के बाद अनिल विज ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह लगातार चुनाव जीतते रहे और आज अंबाला छावनी से सातवीं बार विधायक हैं। हरियाणा में भाजपा की अपने दम पर बनी तीनों सरकारों में वह कैबिनेट मंत्री रहे हैं। गृह, स्वास्थ्य, तकनीकी शिक्षा और अन्य विभागों में उन्होंने अपनी अलग कार्यशैली से पहचान बनाई। प्रशासनिक सख्ती, त्वरित निर्णय और स्पष्ट बयानबाजी उनकी राजनीतिक शैली की विशेषता मानी जाती है।

'हम उस दौर में कैसे जिंदा रहे, यह हम ही जानते हैं'
अनिल विज जब अपने 14 वर्ष के वनवास का जिक्र करते हैं तो भावुक हो उठते हैं। उनका कहना है कि भगवान राम को भी 14 वर्ष का वनवास मिला था, लेकिन वह भगवान थे। वह स्वयं एक साधारण कार्यकर्ता थे, जिन्होंने संघ के आदेश को अंतिम मानते हुए बिना किसी शिकायत के वह कठिन समय बिताया।*उन्होंने कई मंचों पर कहा है, "हम उस दौरान कैसे जिंदा रहे, यह हम ही जानते हैं।"* बताया जाता है कि जब उन्होंने एक कार्यक्रम में अपनी यह पूरी कहानी वरिष्ठ भाजपा नेता और तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के सामने सुनाई, तो मंच पर मौजूद कई नेताओं की आंखें नम हो गई थीं।

संघ और विचारधारा के प्रति निष्ठा ही सबसे बड़ी पूंजी
अनिल विज की राजनीतिक यात्रा केवल चुनावी जीत की कहानी नहीं है, बल्कि संगठन के प्रति निष्ठा, व्यक्तिगत संघर्ष और वैचारिक प्रतिबद्धता का भी उदाहरण मानी जाती है। नौकरी छोड़ने से लेकर 14 वर्षों तक राजनीतिक उपेक्षा सहने और फिर सम्मानपूर्वक वापसी करने तक का उनका सफर हरियाणा की राजनीति में एक अलग अध्याय के रूप में देखा जाता है।

आज भी अनिल विज यह कहते हैं कि उन्होंने कभी किसी दूसरे राजनीतिक दल के प्रलोभन को स्वीकार नहीं किया। मंत्री पद, सत्ता और राजनीतिक अवसर उनके सामने कई बार आए, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की दिशा विचारधारा और संगठन के प्रति विश्वास के आधार पर तय की। यही कारण है कि उनका राजनीतिक जीवन केवल पदों से नहीं, बल्कि संघर्ष और दृढ़ निष्ठा से भी पहचाना जाता है।