UN में डॉ. अम्बेडकर जयंती: IAS राजा शेखर वुनदरू ने बताया संविधान का वैश्विक जुड़ाव
संयुक्त राष्ट्र (UN) में डॉ. अम्बेडकर की 135वीं जयंती पर हरियाणा के ACS डॉ. राजा शेखर वुनदरू का विशेष संबोधन। जानें भारतीय संविधान और UN चार्टर के बीच का गहरा रिश्ता।
चंडीगढ़ : संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, न्यूयॉर्क में भारत के स्थायी मिशन द्वारा डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर उनकी विरासत कार्यक्रम का आयोजन चल रहा है। पहली बार अमेरिका में हरियाणा के वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी ए सी एस डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू को इस कार्यक्रम में विशेष रूप से आमन्त्रित किया गया है हरियाणा के वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी ए सी एस डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने मुख्य वक्ता पर संबोधित करते हुए कहा कि अम्बेडकर औपनिवेशिक ब्रिटिश काल में भारत में संविधान निर्माण के युग का हिस्सा थे और 1930-32 के गोलमेज सम्मेलन के दौरान अधिकांश समितियों में सदस्य के रूप में तत्कालीन संवैधानिक ढाँचे पर कार्य किया जो भारत सरकार अधिनियम अथवा 1935 के औपनिवेशिक संविधान के निमांण में गया। वे 1928 से 935 तक इसके गठन के प्रत्येक विचार-विमर्श में भागीदार थे। आयरलैंड के एमॉन डी वेलेरा, जिन्होंने बाद में 1937 का आयरिश संविधान लिखा, ने 1946 में एडविना माउंटबेटन के एक पत्र के अनुसार भारत के नए संविधान का संचालन करने के लिए डॉ. अम्बेडकर की अनुशंसा की थी संभवतः लंदन में 1935 की संविधान निर्माण प्रक्रिया के दौरान अधिकारों की माँग करते हुए डॉ. अम्बेडकर को ध्यान से देखने के बाद। एमॉन डी वेलेरा, जो बाद में आयरलैंड के प्रधानमंत्री बने, उन शुरुआती व्यक्तियों में से एक थे जिन्होंने राष्ट्रों की समानता के साथ बहुपक्षवाद पर जोर दिया तत्कालीन यूएन में, जिसकी अध्यक्षता उन्होंने 1930 के दशक में की थी।
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर वे व्यक्ति थे जिन्होंने दोनों विश्वयुद्ध देखे। न्यूयॉर्क और लंदन में छात्र के रूप में उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध जिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वे श्रम सदस्य के रूप में ब्रिटिश भारतीय कैबिनेट के सदस्य थे। मानव इतिहास के इन दो उथल-पुथल भरे कालखंडों और एक विश्व निकाय के रूप में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के साक्षी के रूप में डॉ. अम्बेडकर ने बहुपक्षवाद और राष्ट्रों की सहवर्तिता में इसके महत्त्व को समझा। इतिहास के उस क्षण में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर एक ऐसे धुरी-पुरुष के रूप में उभरे जिन्होंने एमॉन डी वेलेरा जैसे महानुभावों की सराहना पहले ही अर्जित कर ली थी और अब वे एक उभरते राष्ट्र के लिए विश्व दृष्टि वाले व्यक्ति थे, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर और यूडीएचआर की समस्त अवधारणाओं पर आधारित लिखित संविधान के माध्यम से राष्ट्रों के संसार में अपनी नियति खोज रहा था और जिसके केंद्र में संवैधानिक नैतिकता थी।
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, भारतीय संविधान को आकार देने में केंद्रीय भूमिका निभाते हुए, यूएन चार्टर और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में निहित यूएन आदर्शों के विकास से भली-भाँति परिचित थे। यह उस उल्लेखनीय ऐतिहासिक समयसंपातन के दौरान हुआ जब भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य था (30 अक्टूबर 1945 को शामिल हुआ) और संविधान सभा की बहसें वैश्विक मानवाधिकारों के द्वितीय विश्वयुद्ध-पश्चात प्रयास के समानांतर चलती रहीं।यूडीएचआर का मसौदा 1947 और 1948 के बीच तैयार हुआ ठीक उसी समय जब भारत का संविधान अंतिम रूप ले रहा था। भारतीय प्रतिनिधियों ने, जिनमें हंसा मेहताडॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि यूडीएचआर का मसौदा 1947 और 1948 के बीच तैयार हुआ ठीक उसी समय जब भारत का संविधान अंतिम रूप ले रहा था। भारतीय प्रतिनिधियों ने, जिनमें हंसा मेहता भी थीं संविधान सभा की सदस्य जो मानवाधिकार पर यूएन आयोग में भी थीं समानता, गैर-भेदभाव और महिला अधिकारों में योगदान किया। यूडीएचआर ने भारत की नागरिक स्वतंत्रताओं और सामाजिक न्याय की राष्ट्रवादी माँगों को नैतिक और अंतर्राष्ट्रीय वैधता प्रदान की।
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि प्रस्तावना के मूल आदर्श "न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिकः विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रताः प्रतिष्ठा और अवसर की समताः तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता" संयुक्त राष्ट्र चार्टर की बारीकी से प्रतिध्वनि करते हैं। यद्यपि डॉ. अम्बेडकर ने पहले (1954 में) कहा था कि उन्होंने "स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व" फ्रांसीसी क्रांति की बजाय मुख्यतः बुद्ध से ग्रहण किया, ये अवधारणाएँ यूएन सिद्धांतों के साथ पूरी तरह सामंजस्यपूर्ण थीं।
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि भारत के संविधान में मूल अधिकार सर्वाधिक प्रवर्तनीय और न्यायसंगत प्रावधान हैं-जैसे समानता और गैर-भेदभावः अस्पृश्यता का उन्मूलन; जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार वाक, सभा और संगठन की स्वतंत्रताः शोषण के विरुद्ध अधिकारः और अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार। डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में इन अधिकारों की न्यायोचितता का बार-बार बचाव करते हुए आग्रह किया कि सार्थक होने के लिए ये राज्य के विरुद्ध प्रवर्तनीय होने चाहिए जो सीधे यूएन की उस दृष्टि के अनुरूप है कि अधिकार वास्तविक हों, केवल आकांक्षात्मक नहीं।
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर का आजीवन संघर्ष मानव गरिमा के लिए था जो जाति-उत्पीड़न के उनके व्यक्तिगत अनुभवों, हाशिए पर धकेले गए समुदायों के लिए दृढ सुरक्षा उपायों, राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ "संवैधानिक नैतिकता" और सामाजिक लोकतंत्र पर बल. तथा इस विश्वास में निहित था कि अधिकार अमृतं नहीं बल्कि सर्वाधिक हाशिए पर पड़े लोगों को ऊपर उठाने के औजार हैं।
डॉक्टर राजा शेखर वुनदरू ने कहा कि 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में प्रारूप संविधान प्रस्तुत करते हुए अम्बेडकर ने कहा था:
"संवैधानिक नैतिकता एक स्वाभाविक भावना नहीं है। इसे पोषित करना होता है। हमें यह महसूस करना होगा कि हमारे लोगों को अभी इसे सीखना है। भारत में लोकतंत्र केवल एक ऊपरी आवरण है उस भारतीय भूमि पर जो मूलतः अलोकतांत्रिक है।"