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भिवानी: कैरू में होली की पारंपरिक तैयारियां शुरू, महिलाएं बना रही हैं गोबर के 'बड़कुले' और 'ढाल'

कैरू क्षेत्र में होली के त्योहार को लेकर महिलाओं ने पारंपरिक तैयारियां शुरू कर दी हैं। बच्चों की दीर्घायु के लिए गाय के गोबर से 'बड़कुले' और 'ढाल' तैयार किए जा रहे हैं। जानें होलिका पूजन की इस सदियों पुरानी रस्म और बदलती परंपराओं के बारे में।

 

कैरू। रंगों के पर्व होली में मात्र पांच दिन शेष हैं। कैरू क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में होली की रंगत छाने लगी है। हर वर्ग होली को अपने-अपने अंदाज में मनाने में लगा है। वहीं परंपरागत तरीके से होली पर्व मनाने को लेकर महिलाओं ने भी तैयारियां शुरू कर दी हैं। महिलाओं ने होलिका पूजन के लिए बड़कुले और ढाल तैयार किए हैं। गाय के गोबर से तैयार की गई ये पारंपरिक चीजे रीति रिवाज से जुड़ी हैं।

होलिका पूजन के दौरान महिलाएं बच्चों की दीर्घायु के लिए ही इन बड़कुलो और ढाल को पूजन के लिए प्रयोग करेंगी। हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार दशमी व एकादशी के दिन घरों में ढाल आदि बनाने शुरू हो जाते हैं जिनकी पूर्णिमा के दिन माला बनाकर पूजा-अर्चना कर उनको भोग लगाया जाता है। इसके बाद शुभ मुहूर्त में होलिका दहन किया जाता है।

होलिका पूजन से करीब सप्ताह भर पहले ही ढाल बुडकूले तैयार किए जाते हैं, ये परंपराएं सदियों से चली आ रही है। होलिका दहन से पहले इनका पूजन होता है। इस दौरान बच्चों की लंबी आयु की कामना भी की जाती है। होली का पर्व परंपराओं से भी जुड़ा हैं, इसलिए ज्यादा भूमिकाएं महिलाओं को ही निभानी पड़ती है।

होली पर्व में रंग और हुड़दंग से अलग होलिका पूजन का विधान भी है। इसके लिए पूजन सामग्री यानी ढाल बुडकूले तैयार करने की कला भी खास होती है। इन्हें पहले अच्छे तरीके से तैयार किया जाता था, लेकिन कुछ बुजुर्ग महिलाओं को ही इस हुनर का ज्ञान है। जबकि आम तौर पर अब अपने-अपने अंदाज और आकार में इन्हें तैयार किया जा रहा है।

होली पर पहले एक महीने से ही ठिठौली होने लगती थी। रिश्तों में देवर और भाभी लगने वाले भी आपस में खूब होली खेलते थे। लेकिन अब ढाल बुडकूले भी कुछ महिलाएं ही तैयार कर पाती हैं, जबकि बाकी तो आधुनिक चीजों को ही पूजन में शामिल करती आ रही हैं। ये त्योहार परंपराओं से जुड़ा है।


परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से त्योहारों की परंपराओं के बारे में बेहतर ज्ञान मिलता है। ये महिलाएं उन त्योहारों को पहले पूरी रीति-रिवाज के साथ मनाने में विश्वास रखती थी। अब समय बदल चुका है। समय का भी अभाव रहता है। ऐसे में जो कुछ मिले उसी को समेटकर त्योहार मनाया जाता है।