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PGI Study on Lymphoma: भारतीय मरीजों के जेनेटिक स्वरूप को समझने में मिली मदद, TP53 और EZB सबटाइप पर शोध

पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ के शोधकर्ताओं ने लिंफोमा मरीजों के जेनेटिक पैटर्न पर अध्ययन किया है। रिसर्च में सामने आया है कि हर मरीज में कैंसर का पैटर्न अलग होता है।

 

चंडीगढ़ पीजीआईएमईआर के शोधकर्ताओं के एक नए और महत्वपूर्ण अध्ययन में यह बात सामने आई है कि लिंफोमा (Lymphoma) के हर मरीज में कैंसर का जेनेटिक पैटर्न एक जैसा नहीं होता है। किसी मरीज में मौजूद आनुवंशिक बदलाव बीमारी को अधिक आक्रामक बना सकते हैं, जबकि कुछ अन्य बदलाव अपेक्षाकृत बेहतर सर्वाइवल से जुड़े हो सकते हैं। इस रिसर्च ने भारतीय मरीजों में लिंफोमा के जेनेटिक स्वरूप को समझने और भविष्य में व्यक्तिगत उपचार (Personalized Treatment) की संभावनाओं की ओर एक नया कदम बढ़ाया है।

🔬 50 मरीजों पर किया गया अध्ययन, नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग तकनीक से हुई 15 जीन की जांच

पीजीआईएमईआर के हेमेटोलॉजी और क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से 'डिफ्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा' (DLBCL) के मरीजों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इस अध्ययन में शामिल मरीजों की औसत उम्र लगभग 51 वर्ष थी, जिनका हाल ही में निदान हुआ था और उन्होंने पहले कोई उपचार नहीं लिया था। कैंसर कोशिकाओं के डीएनए का विश्लेषण नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग तकनीक के जरिए किया गया, जिसमें 15 प्रमुख जीनों का अध्ययन करके बीमारी के जैविक व्यवहार और उपचार के परिणामों के बीच के संबंधों को समझने का प्रयास किया गया।

📊 TP53 जीन में बदलाव और EZB सबटाइप के मिले अलग-अलग परिणाम

अध्ययन के मुख्य निष्कर्षों के अनुसार, करीब 48.1 प्रतिशत मरीजों में 'TP53' जीन में बदलाव देखा गया, जिसे जीनोम का 'गार्डियन' कहा जाता है। इसके कामकाज में गड़बड़ी होने से कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि को रोकने की क्षमता प्रभावित होती है और बीमारी आक्रामक हो सकती है। वहीं, करीब 53.3 प्रतिशत मरीजों में 'EZB' जेनेटिक सबटाइप पाया गया, जिसमें अपेक्षाकृत बेहतर सर्वाइवल के संकेत देखे गए। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक शुरुआती और सीमित अध्ययन है, इसलिए इसके आधार पर फिलहाल मौजूदा उपचार पद्धति में बदलाव की सिफारिश नहीं की गई है, लेकिन यह भविष्य की चिकित्सा रणनीतियों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।