Natural Farming in Haryana News: यमुनानगर के किसान ने पेश की मिसाल, पिछले 5 साल से प्राकृतिक तरीके से कर रहे फसलों की पैदावार
यमुनानगर: रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यमुनानगर के प्रगतिशील किसान गुरनाम सिंह ने खेती का अलग रास्ता चुना है. दरअसल, गुरनाम पिछले पांच सालों से जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं. करीब तीन एकड़ जमीन में वे गेंदे, अरबी और गन्ने सहित कई फसलें प्राकृतिक तरीके से तैयार कर रहे हैं.
खेत में दिखती हरियाली: गुरनाम सिंह के खेत में दूर से सामान्य खेती जैसा नजारा दिखाई देता है, लेकिन फसल तैयार करने का तरीका इसे खास बनाता है. खेत में लहलहाता गन्ना, अरबी के हरे पत्ते और पीले-नारंगी गेंदे के फूल जैविक खेती की तस्वीर पेश करते हैं.
पांच साल से रसायनों से दूरी: गुरनाम सिंह ने बताया कि, " मैंने पांच साल पहले रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल कम करने का फैसला लिया. इसके बाद धीरे-धीरे मैंने अपनी खेती को पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक तरीके की ओर बढ़ाया. अब करीब तीन एकड़ जमीन पर इसी प्रोसेस से फसल तैयार कर रहे हैं."
खाद भी खेत में तैयार: गुरनाम सिंह ने आगे बताया कि, "इस खेती की खासियत यह है कि मैं बाजार से महंगी रासायनिक खाद खरीदने के बजाय प्राकृतिक संसाधनों से खाद तैयार करता हूं. इसके लिए गाय का गोबर, गोमूत्र और खल जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. तैयार जैविक खाद को खेत की फसलों में लगाया जाता है.
"जैविक खेती अपनाने से रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च कम हुआ है. जब खाद और खेती में इस्तेमाल होने वाली कई चीजें हम खुद तैयार करते हैं तो बाजार पर निर्भरता कम होती है और लागत को भी नियंत्रित किया जा सकता है."
गेंदे की फसल बनी आकर्षण: खेत में लगे गेंदे के पीले और नारंगी फूल इसकी अलग पहचान बना रहे हैं. किसान के अनुसार जैविक तरीके से तैयार गेंदे की गुणवत्ता अच्छी रहती है और बाजार में इसकी मांग भी मिलती है. उनका कहना है कि कई बार अच्छी गुणवत्ता वाली फसल का बेहतर भाव मिलने की संभावना रहती है.
मिट्टी की सेहत पर जोर: गुरनाम सिंह कहते हैं कि, " मेरे लिए जैविक खेती सिर्फ फसल उगाने का तरीका नहीं है. मैं मिट्टी की सेहत को भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा मानता हूं. लगातार रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करके प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल करने से जमीन की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है."
प्रकृति के साथ खेती: गन्ने और अरबी की फसल दिखाते हुए गुरनाम सिंह कहते हैं कि, "खेती का मतलब सिर्फ ज्यादा पैदावार लेना नहीं है. मिट्टी, पानी और पर्यावरण को सुरक्षित रखना भी किसान की जिम्मेदारी है. प्राकृतिक खेती में शुरुआत में धैर्य और मेहनत की जरूरत होती है, लेकिन इसके फायदे लंबे समय में दिखाई देते हैं."
प्रशिक्षण से मिली मदद: गुरनाम सिंह को खेती से जुड़े प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन का भी लाभ मिला. इस बारे में उन्होंने बताया कि, "कृषि विभाग की योजनाओं के तहत मिलने वाले प्रशिक्षण, सब्सिडी और कृषि उपकरणों की जानकारी से मुझे जैविक खेती को आगे बढ़ाने में मदद मिली. जैविक खेती में लागत नियंत्रित करने के साथ अच्छी आमदनी का अवसर भी बन सकता है. मैं चाहता हूं कि दूसरे किसान भी अपनी जमीन के कुछ हिस्से में प्राकृतिक खेती का प्रयोग करें और इसके परिणाम देखने के बाद धीरे-धीरे इसे बढ़ाएं."
तीन एकड़ का प्रयोग बना मिसाल: पांच वर्षों से जारी गुरनाम सिंह का प्रयोग यह दिखाता है कि सीमित जमीन पर भी अलग-अलग फसलों के साथ जैविक खेती की जा सकती है. गेंदे के फूलों से लेकर गन्ने और अरबी तक उनकी खेती प्रकृति आधारित कृषि की संभावनाओं को सामने रखती है.गुरनाम सिंह की कहानी में पैदावार और मुनाफे के साथ मिट्टी और पर्यावरण की चिंता भी जुड़ी है. उनका खेत बताता है कि प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर खेती को एक वैकल्पिक दिशा दी जा सकती है.