Haryana Rajya Sabha Polls: क्या राज्यसभा चुनाव में लागू होता है 'व्हिप'? 16 मार्च को हरियाणा की 2 सीटों पर 'खेला' होने का डर; सतीश नांदल की एंट्री से बिगड़ा गणित
हरियाणा राज्यसभा चुनाव 2026 में 2 सीटों के लिए 3 उम्मीदवार मैदान में हैं। संजय भाटिया (BJP) और कर्मवीर बौद्ध (Congress) के बीच निर्दलीय सतीश नांदल की एंट्री ने मुकाबला रोचक बना दिया है। जानें क्यों राज्यसभा में पार्टियों का 'व्हिप' प्रभावी नहीं होता और क्रॉस वोटिंग का इतिहास क्या रहा है।
चंडीगढ़ : हरियाणा में 16 मार्च को होने वाले चुनावों में कोई भी राजनैतिक दल व्हिप लागू नहीं कर सकता। राजनैतिक व संविधान समीक्षकों की माने तो राजनैतिक दल व्हिप जारी तो कर सकते हैं, मगर लागू नहीं कर सकते। राज्यसभा में अतीत में ऐसे उदाहरण बहुत से मिल सकते है, जिनमें हिमाचल प्रदेश के अंदर हुए चुनावों का ताजा उदाहरण रहा है।जब सत्ता पक्ष कांग्रेस के उम्मीदवार ही हार गए व भाजपा के हर्ष महाजन के पक्ष में कांग्रेस व निर्दलीय विधायकों ने खेला कर दिया।पूर्व में हिमाचल में हुए राज्यसभा चुनाव में सत्ता दल कांग्रेस में तारपिडो करते हुए कांग्रेस के 6 विधायकों और 3 निर्दलीय विधायकों से बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन के पक्ष में मतदान हुआ था।
हरियाणा का इतिहास देखे तो पिछले दो राज्यसभा चुनावों में यही हुआ। भाजपा या निर्दलीय सांसद जीत गए और कांग्रेस के दिग्गज उम्मीदवार हार गए। राज्यसभा चुनाव में जून 2022 (पिछला चुनाव) जो 10-11 जून 2022 को हुआ था। हरियाणा से कुल 2 राज्यसभा सीटें थीं। भारतीय जनता पार्टी के कृष्ण लाल पंवार ने पहली सीट जीत ली थी। दूसरी सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा जीते, जिनका समर्थन भाजपा ने हासिल किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन हार गए। इस चुनाव में भाजपा के पास हरियाणा विधानसभा में पर्याप्त संख्या विधायकों की थी। एक सीट भाजपा के पारंपरिक संख्याबल के कारण पक्की थी, लेकिन दूसरी सीट पर निर्दलीय (भाजपा-समर्थित) उम्मीदवार को जीत मिली क्योंकि कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी। हरियाणा के राज्यसभा चुनावों में “पेन–स्याही” विवाद इससे पहले बड़े स्तर पर दर्ज नहीं हुआ था। 2022 की घटना को राज्य के राज्यसभा चुनावों का सबसे चर्चित प्रक्रियात्मक विवाद माना जाता है।
हरियाणा की राजनीति में वर्ष 2016 का राज्यसभा चुनाव बेहद चर्चित और नाटकीय घटनाक्रम के रूप में याद किया जाता है। 11 जून 2016 को हुए इस चुनाव ने यह साबित किया कि राज्यसभा का चुनाव केवल उम्मीदवारों की लोकप्रियता नहीं, बल्कि विधानसभा के ठोस गणित और राजनीतिक प्रबंधन पर निर्भर करता है।इस चुनाव में दो सीटों के लिए मतदान हुआ। प्रमुख उम्मीदवार थे: सुभाष चंद्रा निर्दलीय, लेकिन भाजपा समर्थित, आर के आनंद — निर्दलीय उम्मीदवार, कांग्रेस का अधिकृत प्रत्याशी। विधानसभा में भाजपा स्पष्ट बहुमत था। यही बहुमत चुनाव की दिशा तय करने वाला साबित हुआ। भाजपा के पास अपने विधायकों का मजबूत और संगठित समर्थन था। पार्टी ने सुभाष चंद्रा को समर्थन देकर चुनाव को रणनीतिक रूप से संचालित किया।
दूसरी ओर आर.के. आनंद निर्दलीय उम्मीदवार थे और उनके पास किसी बड़े दल का ठोस समर्थन नहीं था। विपक्षी खेमे में भी उस समय पूर्ण एकजुटता नहीं दिखी। आर.के. आनंद संख्या बल की कमी थी। उनके पक्ष में पर्याप्त विधायक नहीं जुट पाए।यह चुनाव इसलिए चर्चित हुआ क्योंकि इसमें राजनीतिक प्रबंधन, क्रॉस वोटिंग की चर्चाएँ और संख्या बल का सीधा प्रभाव देखने को मिला।आर.के. आनंद की हार ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्यसभा चुनाव में व्यक्तिगत पहचान से अधिक महत्वपूर्ण होता है — विधानसभा का अंकगणित और दलों की रणनीतिक एकजुटता। 2016 का हरियाणा राज्यसभा चुनाव एक उदाहरण है कि किस प्रकार बहुमत, रणनीति और संगठनात्मक शक्ति चुनाव परिणामों को प्रभावित करते हैं। आर.के. आनंद की पराजय केवल व्यक्तिगत हार नहीं थी, बल्कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और विधानसभा गणित का परिणाम थी।
हरियाणा में सीटों के वर्गीकरण के आधार पर भाजपा एक सीट संजय भाटिया की जीतने जा रही है।केवल परिणाम घोषित होने की औपचारिकता ही बची है।दूसरी सीट भी कांग्रेस के 37 विधायक होने के नाते संख्या बल के आधार पर कांग्रेस के पक्ष में जानी चाहिए।मगर इस सीट पर निर्दलीय सतीश नांदल सामने चुनाव मैदान में है।अगर कांग्रेस में कोई खेला हुआ तो वोटों का गणित बिगड़ सकता है।क्रास वोटिंग का खतरा अतीत की भांति कांग्रेस में मंडरा न जाए,इस पर सबकी निगाहें हैं।