Death Sutak Niyam: परिवार में किसी की मृत्यु के बाद बरती जाने वाली सावधानियां, गरुड़ पुराण के अनुसार नियम
हिंदू धर्म में किसी की मृत्यु के बाद 10 से 13 दिनों तक मृत्यु सूतक माना जाता है। जानिए इस दौरान कौन-से धार्मिक और सामाजिक कार्य वर्जित होते हैं।
हिंदू सनातन धर्म में जन्म और मृत्यु दोनों ही जीवन के महत्वपूर्ण और प्राकृतिक पड़ाव माने गए हैं, जिनसे जुड़े कई नियम और परंपराएं शास्त्रों में बताई गई हैं। गरुड़ पुराण में इन सभी पहलुओं का विस्तार से उल्लेख मिलता है। परिवार में किसी नए शिशु के जन्म या किसी सदस्य की मृत्यु के बाद एक निश्चित समयावधि के लिए 'सूतक' मानने की परंपरा है। इस दौरान परिवार के सदस्यों को कुछ विशेष नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है, और कई प्रकार के मांगलिक व धार्मिक कार्यों को करना वर्जित माना जाता है ताकि शोक और शुद्धि की प्रक्रिया पूरी हो सके।
⏳ क्या होता है मृत्यु सूतक? दाह संस्कार से नहीं, बल्कि मृत्यु के दिन से शुरू होती है अवधि
परिवार के किसी सदस्य के निधन के बाद परिजनों और सगे-सम्बन्धियों को लगने والی अशुद्धि या शोक की विशिष्ट अवधि को 'मृत्यु सूतक' या 'मृत पातक' कहा जाता है। सामान्य तौर पर यह अवधि 10 से 13 दिनों (यानी तेरहवीं संस्कार तक) की होती है, जो अलग-अलग समाजों और पारिवारिक परंपराओं के आधार पर भिन्न हो सकती है। सबसे खास बात यह है कि सूतक की यह गणना दाह संस्कार के दिन से नहीं, बल्कि व्यक्ति की मृत्यु के दिन से ही प्रभावी मानी जाती है। इस दौरान परिवार के सदस्य सात्विक जीवन जीते हैं और 13वें दिन शुद्धि यज्ञ व कर्मकांड के बाद ही सूतक समाप्त होता है।
🚫 गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु सूतक काल में भूलकर भी न करें ये काम
गरुड़ पुराण के मुताबिक सूतक काल के दौरान परिवार के लोगों को विशेष संयम बरतना पड़ता है और निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है:
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पूजा-पाठ और अनुष्ठान: घर के मंदिर में दीपक जलाना, देवी-देवताओं की पूजा, हवन या मंत्र जप करना वर्जित होता है।
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धार्मिक ग्रंथों का पाठ: इस दौरान गरुड़ पुराण को छोड़कर अन्य किसी भी वेद-पुराण या धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन नहीं किया जाता है।
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मांगलिक कार्य: विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश या किसी भी प्रकार के शुभ उत्सवों व आयोजनों में भाग लेना या उन्हें करना पूरी तरह निषेध है।
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स्पर्श और अभिवादन नियम: इस अवधि में किसी के चरण स्पर्श न करें और न ही आगत अतिथियों का खड़े होकर या हाथ जोड़कर पारंपरिक स्वागत करें। लोगों से गले मिलना या स्पर्श करना भी वर्जित है।
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खानपान और श्रृंगार: परिवार के लोग सामूहिक भोज (पंगत) में शामिल नहीं होते और भोजन में हल्दी का प्रयोग वर्जित रहता है। साथ ही नए वस्त्र पहनना, बाल-दाढ़ी बनवाना या किसी भी प्रकार का श्रृंगार नहीं किया जाता है।