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घर में पूजा या मंदिर दर्शन: कौन सा है ज्यादा जरूरी? जानें गुरुजी का जवाब

क्या घर पर पूजा करना काफी है? ज्योतिषी डॉ. बसवराज गुरुजी से जानें घर और मंदिर की पूजा में अंतर और क्यों आध्यात्मिक पूर्णता के लिए दोनों ही आवश्यक हैं।

 

कई बार लोगों के दिमाग में सवाल उमड़ता रहता है कि जब घर में पूजा कर ली है तो मंदिर जाने की क्या जरूरत है? इसको लेकर हर श्रद्धालु के पास ये उत्तर होता है कि भगवान हर जगह होता है. ऐसे में जानते हैं कि क्या वास्तव में घर पर पूजा करने और मंदिर जाने में अंतर है या दोनों ही जरूरी हैं? दरअसल, इसको लेकर प्रख्यात ज्योतिषी डॉ. बसवराज गुरुजी ने अपने जानकारी दी है.

उन्होंने कहा कि कई लोगों को लगता है कि अगर घर पर पूजा और जप करना ही काफी है, तो मंदिर क्यों जाना? पूजा के दोनों तरीकों का अपना-अपना महत्व है और आध्यात्मिक संतुष्टि के लिए ये एक-दूसरे के पूरक हैं. घर में की जाने वाली पूजा मुख्य रूप से हमारी व्यक्तिगत संतुष्टि और अंतर्मन की शुद्धि के लिए होती है. घरों में रखी मूर्तियां आमतौर पर शास्त्रों के अनुसार स्थापित या प्रतिष्ठित नहीं की जाती हैं. वे हमारी भक्ति का प्रतीक हैं और अंतर्मन की शुद्धि में सहायक होती हैं. स्नान और शुद्ध मन से घर में की गई पूजा हमारे शरीर के भीतर अंतर्मन की शुद्धि करती है. इसकी तुलना नदी के जल से की जा सकती है – जो शुद्ध और व्यक्तिगत होता है.

मंदिर होते हैं शक्ति के केंद्र

गुरुजी ने कहा कि इसके विपरीत मंदिर शक्ति के केंद्र होते हैं. यहां शास्त्रों के अनुसार, वैदिक मंत्रों के साथ मूर्तियों को भूमि में स्थापित किया जाता है और प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. मंदिरों में तीन दिनों की पूजा की जाती है, देवता विराजमान होते हैं और उनमें पंच तत्वों को नियंत्रित करने की शक्ति होती है. पुरोहित अपनी भक्ति से पत्थर को भी शंकर में परिवर्तित कर सकते हैं. ये पूजनीय स्थान हमारे शरीर के बाहरी अंगों, अर्थात् आंखों, कानों, नाक और हाथों को एक विशेष आभा प्रदान करते हैं. मंदिर की शक्ति दिव्य ऊर्जा को बढ़ाती है और जहां भी हम जाते हैं, सफलता दिलाती है. इसकी तुलना पुण्य की नदी से की जाती है – जो सार्वभौमिक शुद्धिकरण शक्ति है.

उन्होंने कहा कि जब हम घर में उपासना करके अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं और उस शुद्ध शरीर और मन से मंदिर जाते हैं, तो मंदिर की ऊर्जा हमारे बाहरी शरीर को भी शुद्ध करती है और हमें दिव्य प्रभाव प्रदान करती है. इससे हमारा जीवन परिपूर्ण हो जाता है. यदि घर के ईश्वर को जड़ माना जाए, तो मंदिर उस जड़ से उगने वाले वृक्ष के समान है, जो फल देता है.

घर पर पूजा और मंदिर जाना दोनों जरूरी

गुरुजी के मुताबिक, घर पर पूजा और मंदिर दर्शन दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं. यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इन दोनों में से किसी एक को चुनने का कोई विकल्प नहीं है. मंदिर में प्राप्त होने वाली मन की शांति, जप, आहुति और तपस्या सभी के लिए लाभकारी हैं. हिंदू सनातन संस्कृति की नींव आस्था है. गुरुजी ने सलाह दी है कि ये दोनों ही पूजा विधियां हमारे आध्यात्मिक और सांसारिक जीवन की समृद्धि के लिए जरूरी हैं.