सुप्रीम कोर्ट की ममता बनर्जी को फटकार: 'जांच में दखल देकर लोकतंत्र को खतरे में डाला'
बंगाल I-PAC छापेमारी केस में सुप्रीम कोर्ट सख्त। SC ने कहा- मौजूदा सीएम जांच में दखल देंगी, संविधान विशेषज्ञों ने ऐसा नहीं सोचा था। 5 जजों की बेंच की मांग खारिज।
सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को बंगाल IPAC छापेमारी केस की सुनवाई हुई. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर बड़ी सख्त टिप्पणी की. SC ने कहा कि जब कोई मुख्यमंत्री किसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा की जा रही जांच में हस्तक्षेप करता है, तो इसे केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं कहा जा सकता. SC ने कहा कि एक मौजूदा सीएम जांच में दखल देंगी ऐसा सोचा नहीं था. संविधान विशेषज्ञों ने भी ऐसा नहीं सोचा था. एक तरह से ममता ने लोकतंत्र को खतरे में डाला है. सुप्रीम कोर्ट ने छापे के दौरान ममता के मौके पर पहुंचने पर उन्हें फटकार भी लगाई है.
दरअसल, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारी की पीठ प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दायर रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी. इन अधिकारियों पर तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक सलाहकार I-PAC के घर पर ईडी के छापे में बाधा डालने का आरोप था. ईडी अधिकारियों द्वारा भी एक संबंधित रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती दी गई थी.
बंगाल सरकार के तर्क पर जताई असहमति
राज्य सरकार यानी टीएमसी की वकील ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत ईडी द्वारा दायर रिट याचिका की वैधता पर सवाल उठाया. राज्य के अधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि यह मामला मूलतः राज्य और केंद्र के बीच का विवाद है, इसलिए अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका के बजाय भारत के संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत मुकदमा दायर किया जाना चाहिए. इस तर्क से असहमत होते हुए न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि इसमें राज्य का क्या अधिकार निहित है? यह राज्य और केंद्र सरकार के बीच का विवाद नहीं है. आप बीच में नहीं आ सकते. किसी भी राज्य का कोई भी मुख्यमंत्री किसी जांच के बीच में आ जाए और आप कहें कि यह मूलतः राज्य और केंद्र सरकार के बीच का विवाद है?
पूरी व्यवस्था और पूरे लोकतंत्र को दांव पर लगाया
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा आपत्तिजनक सामग्री भी ले जाई गई थी. तब न्यायमूर्ति कुमार ने डीजीपी की तरफ से पेश हुए वकील से कहा कि यह राज्य और केंद्र के बीच का विवाद नहीं है. यह एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कृत्य है जो संयोगवश एक राज्य का मुख्यमंत्री है, और उसने पूरी व्यवस्था और पूरे लोकतंत्र को दांव पर लगा रखा है. आप कह रहे हैं कि यदि यह सब सुनवाई योग्य है तो इसे अनुच्छेद 32 के तहत नहीं बल्कि केवल अनुच्छेद 132 के तहत सुनवाई योग्य माना जा सकता है. सॉलिसिटर जनरल आपने हमें केशवानंद भारती और सीरवाई के उदाहरण दिए हैं. लेकिन उनमें से किसी ने भी इस स्थिति की कल्पना नहीं की होगी कि इस देश में एक दिन ऐसा आएगा जब एक मौजूदा मुख्यमंत्री किसी अन्य एजेंसी के कार्यालय में जाएगा.
मामले को 5 जजों की बेंच के पास भेजने की मांग खारिज
इससे पहले टीएमसी की वकील मेनका गुरुस्वामी ने इस याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए और मामले को 5 जजों की बेंच के पास भेजने की मांग की. सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि आखिर इसमें ऐसा कौन सा बड़ा संवैधानिक सवाल है जिसे बड़ी बेंच को भेजा जाए? अदालत ने साफ किया कि हर अनुच्छेद 32 की याचिका को बड़ी बेंच को नहीं सौंपा जा सकता. यह सुनवाई ईडी अधिकारियों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर हो रही है जिनमें सीबीआई जांच की मांग की गई है.