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Truth Prevails in Bhiwani Court: भिवानी कोर्ट का बड़ा फैसला, झूठे चाकूबाजी केस में शिक्षिका और पति निर्दोष साबित

भिवानी कोर्ट ने 7 साल पुराने झूठे मुकदमे में दंपत्ति अशोक और रुचि को बाइज्जत बरी किया। आईएएस के प्रभाव में दर्ज हुआ था केस।
 

न्याय की जीत : 7 साल पुराने हाई-प्रोफाइल दबाव वाले मामले में दंपत्ति निर्दोष बरी, आईएएस के प्रभाव में दर्ज हुआ था केस


भिवानी, 26 अगस्त : सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। इस बात को एक बार फिर साबित किया है भिवानी की अदालत के एक अहम फैसले ने। वर्ष 2019 में भिवानी के हाऊसिंग बोर्ड सोसायटी दादरी गेट में एक 65 वर्षीय महिला द्वारा पड़ोस में रहने वाले दंपत्ति अशोक और उनकी पत्नी रुचि पर घर में घुसकर चाकू से हमला करने का जो मामला दर्ज कराया गया था, उसमें अदालत ने दोनों को पूरी तरह निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया है। सुखबीर सिंह ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रस्तुत सबूतों और गवाहों के विरोधाभास के आधार पर आरोपी दंपत्ति को बाइज्जत बरी करने का आदेश सुनाया।
     

जानकारी के अनुसार वर्ष 2019 में भिवानी पुलिस ने एक महिला की शिकायत पर पड़ोसी अशोक और उसकी पत्नी रुचि जो पेशे से स्कूल शिक्षिका हैं के खिलाफ मामला दर्ज किया था। इस मामले की सबसे खास बात यह रही कि महिला ने पुलिस को लिखित शिकायत शाम 5 बजे दी थी, जबकि पुलिस ने आरोपी अशोक को सुबह 10 बजे ही हिरासत में ले लिया था। बचाव पक्ष के अनुसार ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि शिकायतकर्ता महिला का बेटा उस समय एक अन्य राज्य में आईएएस अधिकारी के पद पर कार्यरत था और एक प्रभावशाली नेता का असिस्टेंट सेक्रेटरी था। आरोप है कि आईएएस अधिकारी ने अपने प्रशासनिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए पुलिस पर दबाव बनाया और फोन करवाकर झूठा मुकदमा दर्ज करवाया था।
     

पुलिस के खौफ और प्रशासनिक दबाव के चलते उस वक्त अशोक को जेल जाना पड़ा। वहीं, मौके पर मौजूद न होने के बावजूद जब पुलिस ने उसकी शिक्षिका पत्नी रुचि को पकडऩे का प्रयास किया, तो वे अपने मायके सोनीपत चली गईं और अधिवक्ता मुकेश गुलिया के माध्यम से अदालत से अग्रिम जमानत हासिल की। अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान शिकायकर्ता महिला, पुलिसकर्मियों और डॉक्टरों की गवाही हुई। पीडि़त दंपत्ति की तरफ से पैरवी कर रहे अधिवक्ता मुकेश गुलिया ने अदालत के सामने पुलिस और शिकायतकर्ता की थ्योरी की धज्जियां उड़ा दीं। कोर्ट के समक्ष बचाव पक्ष द्वारा अधिवक्ता मुकेश गुलिया द्वारा विभिन्न बिंदु रखे गए।  जिसमें उन्होंने कहा कि शिकायत के अनुसार महिला पर कथित चाकू से हमला सुबह 8 बजे हुआ, लेकिन वह अस्पताल शाम 7 बजे 11 घंटे बाद पहुंची। महिला का पति जो इस घटना का मुख्य प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था, वह अपनी ही पत्नी के पक्ष में कोर्ट में गवाही देने नहीं आया। वही डॉक्टर ने अपनी गवाही में साफ किया कि महिला के शरीर पर न तो कोई गंभीर चोट थी और न ही खून के निशान थे। इसके अलावा पुलिस पूरी हाऊसिंग बोर्ड सोसायटी में एक भी ऐसा स्वतंत्र गवाह पेश नहीं कर सकी, जिसने झगड़ा होते देखा हो। अधिवक्ता मुकेश गुलिया ने बताया कि महिला कोर्ट में यह तक नहीं बता पाई कि आरोपी उसके घर में दरवाजे से घुसे थे या दीवार फांदकर। इसके अलावा, जिन 5-6 लोगों द्वारा बीच-बचाव करने का दावा किया गया था, महिला उनमें से किसी का नाम नहीं बता सकी।
     

मामले में मिली इस बड़ी जीत अधिवक्ता मुकेश गुलिया ने कहा कि यह केस कानून के दुरुपयोग और प्रशासनिक ताकत के अहंकार का प्रत्यक्ष उदाहरण था। एक आईएएस अधिकारी ने अपने पद और प्रभाव का गलत इस्तेमाल करके एक बेकसूर दंपत्ति का जीवन दांव पर लगा दिया था। पुलिस ने भी बिना किसी जांच के, केवल ऊपर से आए एक फोन पर सुबह 10 बजे ही आरोपी को उठा लिया, जबकि कागजी शिकायत शाम 5 बजे दर्ज दिखाई गई। हमने अदालत के सामने मेडिकल रिपोर्ट, समय के विरोधाभास और पुलिस की जल्दबाजी को प्रमुखता से रखा। न्यायपालिका ने साबित कर दिया कि कानून की नजर में एक आम नागरिक और प्रभावशाली अधिकारी बराबर हैं। अदालत द्वारा अशोक और रुचि को निर्दोष बरी किया जाना सच और न्याय की बहुत बड़ी जीत है।अधिवक्ता मुकेश गुलिया के साथ दंपत्ति अशोक और उनकी पत्नी रुचि।