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भिवानी न्यूज़: दिनोद आश्रम में हुजूर कंवर साहेब जी का सत्संग, बताया भक्ति का सच्चा मार्ग

दिनोद आश्रम भिवानी में परमसंत हुजूर कंवर साहेब जी ने साध-संगत को दिया आशीर्वाद। जानें क्यों जरूरी है सतगुरु और कैसे मन की निर्मलता से मिलता है परमात्मा।

 
भिवानी।।24.05.2026।। दिनोद गांव स्थित राधास्वामी आश्रम में आयोजित दैनिक सत्संग में परमसंत हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने साध-संगत को आशीर्वाद देते हुए कहा कि वेद, शास्त्र तथा संत-महापुरुषों की वाणी परम सत्य और अनुभव की धरोहर है। संतों की बानी को जस का तस ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि संतों के मुख से निकला प्रत्येक शब्द ब्रह्मांड का नाद होता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में ज्ञान की कमी के कारण संत वाणी का उच्चारण और अर्थ विकृत हो रहे हैं, जिससे उसके वास्तविक भाव बदल जाते हैं।
हुजूर कँवर साहेब जी महाराज ने कहा कि संतों ने अपनी वाणी उस समय की परिस्थितियों और अपने दिव्य अनुभवों के आधार पर प्रकट की थी। युग बदलने के बाद भी संत बानी उतनी ही यथार्थ और कल्याणकारी है जितनी उस समय थी। उन्होंने कहा कि निरर्थक वाद-विवाद केवल अशांति फैलाता है, जबकि सत्संग मनुष्य को चरित्रवान, संयमी और सात्विक बनाता है।साध-संगत को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि “जैसी मन की गति होती है, वैसी ही मनुष्य की नियति बनती है।” भक्ति मनुष्य को सच्चा और सुरखुरू बनाती है, परंतु यदि भक्ति के पश्चात भी व्यक्ति के भीतर निंदा, चुगली, छल और चोरी जैसी प्रवृत्तियाँ बनी रहें तो वह भक्ति नहीं बल्कि चतुराई मात्र है।परमसंत हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने कहा कि मन को साधने के लिए सतगुरु की आवश्यकता होती है। सतगुरु वह दिव्य कड़ी है जो जीव को जगत से मोड़कर परमात्मा से जोड़ती है। जीव काल और माया का कैदी है तथा मनुष्य अपनी बुद्धि और चतुराई से आध्यात्मिक मार्ग प्राप्त नहीं कर सकता। परा विद्या के मार्ग में केवल मन की निर्मलता और गुरु की कृपा ही सहायक होती है।उन्होंने कहा कि गुरु के वचन संसारिक रस में डूबे हुए मनुष्य को प्रारंभ में कठोर प्रतीत होते हैं, क्योंकि उसकी जिह्वा को जगत के भोगों का स्वाद लगा होता है। मनुष्य को अपने कर्म और धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। ऐसा कर्म करना चाहिए जिसमें धर्म निहित हो, क्योंकि धर्मविहीन मनुष्य कभी सत्कर्म अर्जित नहीं कर सकता।महाराज जी ने कहा कि कलियुग में संतों ने सरल और सहज भक्ति मार्ग प्रदान किया है, जो मनुष्य को संसारिक बंधनों से मुक्त कर सकता है। सतगुरु मनुष्य को मर्यादाओं में बांधता है और इन्हीं मर्यादाओं के आधार पर सात्विक जीवन की स्थापना होती है।उन्होंने संतमत की व्याख्या करते हुए कहा कि संतमत प्रीत, प्रतीति और प्रेम का मार्ग है। गुरु से प्रीत होने पर ही प्रतीति उत्पन्न होती है और प्रतीति अंततः प्रेम को जन्म देती है। संतमत करनी का मत है — “जो करेगा वही पाएगा।” गुरु की कृपा के बिना साधना और करनी संभव नहीं।अपने प्रवचन में उन्होंने रावण और भक्त प्रह्लाद का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि मनुष्य गुरु की संगति में बढ़ता है तो उसका जीवन भक्त प्रह्लाद की भांति धन्य हो जाता है, अन्यथा अहंकार और माया सब कुछ नष्ट कर देते हैं। उन्होंने कहा कि भक्ति का मार्ग अहंकार छोड़ने वालों का मार्ग है।अंत में परमसंत हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने कहा कि प्रकृति मनुष्य को वही लौटाती है जो वह संसार को देता है। इसलिए प्रेम, सेवा, संयम और सत्कर्म के मार्ग पर चलकर ही मानव जीवन सफल बनाया जा सकता है।सत्संग में दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं ने भाग लिया तथा संतमत के इन अमूल्य विचारों को जीवन में धारण करने का संकल्प लिया।