- उर्वरकों का संतुलन से ही खेती का कल है: डॉ. ममता फौगाट
भिवानी, 10 जून। डीसी साहिल गुप्ता के मार्गदर्शन में चलाए जा रहे "खेत बचाओ अभियान" के तहत गांव गुजरानी, गागड़वास, बशीरवास और नौरंगाबाद में किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग के प्रति जागरूक करने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए। कृषि विज्ञान केंद्र, भिवानी के वैज्ञानिकों ने किसानों को मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने तथा टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिक खेती अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिक डॉ. मीनू तथा सोयल साइंटिस्ट डॉ. ममता फौगाट ने किसानों को जानकारी देते हुए बताया कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करती है और लंबे समय में उत्पादन क्षमता को कम कर देती है। उन्होंने कहा कि उर्वरकों का संतुलित उपयोग ही खेती के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है।
डॉ. ममता फौगाट ने किसानों को बताया कि संतुलित उर्वरक उपयोग का अर्थ मृदा जांच के आधार पर वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करना है। उन्होंने किसानों को रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ गोबर खाद, कम्पोस्ट और जैव उर्वरकों के उपयोग पर भी बल दिया। इससे मिट्टी की संरचना में सुधार होता है, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर होती है तथा फसलों की पैदावार और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है।
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के बारे में भी जानकारी दी और बताया कि इस योजना के माध्यम से किसानों को उनकी भूमि की वास्तविक स्थिति के अनुसार उर्वरकों के उपयोग की वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध करवाई जाती है। इससे उत्पादन लागत कम करने, पर्यावरणीय प्रदूषण घटाने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में सहायता मिलती है। उन्होंने कहा कि सरकार भी संतुलित उर्वरक उपयोग और संवहनीय कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
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किसानों को चार 'आर' सिद्धांत — सही मात्रा, सही समय, सही तरीका और सही प्रकार के उर्वरक — को अपनाने का संदेश दिया गया ताकि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से बचा जा सके और उनका विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित हो सके।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की कि वे इस संदेश को अपने गांवों के अन्य किसानों तक भी पहुंचाएं और संतुलित उर्वरक उपयोग को जन-आंदोलन का रूप देने में सहयोग करें। उन्होंने कहा कि मिट्टी की सेहत सुरक्षित रहेगी तो खेती लाभकारी बनेगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए कृषि संसाधनों का संरक्षण भी संभव हो सकेगा।