Dinod Dham Satsang: सच्चाई, परोपकार और निर्मल मन से ही संभव है परमात्मा की भक्ति — परमसंत कंवर साहेब जी महाराज
दिनोद धाम में परमसंत सतगुरु हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि सच्चाई, परोपकार और निर्मल मन से ही परमात्मा की भक्ति संभव है।
सच्चाई, परोपकार और निर्मल मन से ही संभव है परमात्मा की भक्ति: परमसंत हुजूर कंवर साहेब जी महाराज
दिनोद धाम, 25 अक्टूबर। परमात्मा की सच्ची भक्ति के लिए मनुष्य का सत्य के मार्ग पर चलना, परोपकार की भावना अपनाना और अपने मन को विकारों से मुक्त करना आवश्यक है। दूसरों की बुराइयाँ देखने के बजाय अपने भीतर झाँककर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। यह सत्संदेश परमसंत सतगुरु हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने रविवार को दिनोद धाम में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दिया। हुजूर महाराज ने फरमाया कि परमात्मा उनका है, जो उसके हुक्म और नियमों में बंधकर जीवन व्यतीत करते हैं। परमात्मा अपने भक्तों पर कभी आँच नहीं आने देता। मनुष्य को स्वयं को परमात्मा के प्रति समर्पित कर देना चाहिए, क्योंकि परमात्मा सदैव अपने भक्तों का है। दूसरों की बुराई देखने के बजाय उनकी अच्छाइयों को देखना चाहिए और यदि बुराई देखनी ही है तो अपने भीतर देखनी चाहिए। जब तक मनुष्य सच्चाई के रास्ते पर नहीं चलता, तब तक उसके हृदय में सच्ची भक्ति का संचार नहीं हो सकता। संत पलटू दास के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने बताया कि जब प्रेम की लौ हृदय में जागती है, तभी सच्ची भक्ति का जन्म होता है।
पलटू दास के जीवन में परिवर्तन भी परमात्मा के प्रति प्रेम और विश्वास के जागरण से आया। उन्होंने बताया कि एक बार मंदिर के पुजारी ने दो भक्तों को पलटू की दुकान से राशन लेने भेजा, लेकिन पलटू ने उधार देने से मना कर दिया। इससे मंदिर में भगवान के भोग की व्यवस्था को लेकर चिंता उत्पन्न हो गई। इसी रात पलटू के घर तीन बालक पीले वस्त्र धारण करके पहुँचे और उसे राशन के पैसे देकर चले गए। अगले दिन जब पलटू राशन लेकर मंदिर पहुँचा और पुजारी से उन बालकों के बारे में पूछा, तो पुजारी ने बताया कि उसने किसी को नहीं भेजा था। इस पर पलटू ने भगवान श्रीराम और लक्ष्मण की तस्वीर की ओर संकेत करते हुए कहा कि वे ही बालक उसके घर आए थे। इस घटना ने पलटू के जीवन की दिशा बदल दी और उसके भीतर भक्ति की भावना जागृत हुई। हुजूर महाराज ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि जिस प्रकार साबुन कपड़ों के दाग साफ करता है, उसी प्रकार परमात्मा का नाम मनुष्य की आत्मा पर जमी विकारों की मैल को साफ करता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार में किसी का छोटा-सा उपकार भी जीवनभर याद रखता है, लेकिन जिस परमात्मा ने उसे जीवन दिया, उसका स्मरण करना भूल जाता है। हुजूर कंवर साहेब जी महाराज ने कहा कि गंदे बर्तन में कितनी ही स्वच्छ वस्तु डाल दी जाए, वह भी दूषित हो जाती है। इसी प्रकार मैले मन में अच्छे विचार भी अपना प्रभाव खो देते हैं।
इसलिए मनुष्य को अपने मन के विषय-विकारों को दूर करना चाहिए। जब मन निर्मल हो जाता है, तब परमात्मा की अनुभूति अपने हृदय में ही होने लगती है। उन्होंने परोपकार की महत्ता बताते हुए कहा कि नेकी करके उसका प्रतिफल पाने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सच्ची नेकी वही है, जिसे निस्वार्थ भाव से किया जाए। जो व्यक्ति हमारा हित करता है, उसके उपकार को स्वीकार करना और उसके प्रति कृतज्ञ रहना भी अच्छे संस्कारों का प्रतीक है। उन्होंने संदेश दिया कि दूसरों से अपेक्षा करने के बजाय पहले स्वयं को उस योग्य बनाना चाहिए। सामाजिक जीवन में बढ़ती ईर्ष्या और स्वार्थ पर चिंता व्यक्त करते हुए हुजूर महाराज ने कहा कि आज मनुष्य कई बार अपने दुख से उतना दुखी नहीं होता, जितना दूसरों के सुख को देखकर दुखी हो जाता है। वह अपने पास उपलब्ध संसाधनों और खुशियों से आनंदित होने के बजाय दूसरों की वस्तुओं को पाने और उन पर अधिकार करने की इच्छा रखता है। यह प्रवृत्ति मनुष्य को मानसिक अशांति की ओर ले जाती है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे अपने जीवन में संतोष, सद्भाव, प्रेम, दया और परोपकार को स्थान दें। दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या करने के बजाय उससे प्रेरणा लें तथा अपने आचरण को बेहतर बनाएं। हुजूर महाराज के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, निस्वार्थ सेवा, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं को जीवन में अपनाने का संदेश दिया।