Spiritual News 2026: संत और राम में कोई अंतर नहीं, दिनोद में संत ताराचंद के अवतरण दिवस पर बोले हुजूर कंवर साहेब
दिनोद में परमसंत सतगुरु ताराचंद महाराज का 102वां अवतरण दिवस श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। हुजूर कंवर साहेब ने संगत को सत्संग का रसपान कराया।
दिनोद।।10.10.2026।। तरुवर सरोवर संत और मेघ स्वयं के लिए बल्कि परमार्थ के लिए देह धरते हैं परमार्थ के इसी संकल्प को सिद्ध करने परमात्मा ने संत ताराचंद के रूप में आज ही के दिन इस भूमि पर देह धारी थी। परमसंत ताराचंद जी साक्षात कुल मालिक अवतार थे जो इस मरुस्थलीय परिवेश में भक्ति का बाग खिलाने आए थे।संत और राम में कोई अन्तर नहीं होता।जैसे काठ में आग छिपी होती है फूल में सुगंध समाई होती है महेंदी के पत्ते में लाली छिपी है दूध में घी समाया हुआ है वैसे ही संतों में राम समाया हुआ है।धन्य है वो इंसान जिन्होंने साक्षात ताराचंद के रूप में प्रभु के दर्शन किए।यह सत्संग बानी परम संत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज ने अपने गुरु कुल मालिक अवतार ताराचंद महाराज के 102वें अवतरण दिवस पर उमड़ी संगत को फ़रमाई।अपने गुरु को स्मरण करते हुए हुज़ूर कँवर साहेब जी महाराज ने कहा कि वो भूमि बड़ी पवित्र होती है जहाँ संतों का अवतरण होता है।संत कभी किसी बनाये रास्ते पर नहीं चलते वो अपना रास्ता खुद बनाते हैं और यही रास्ता बनाने परमसंत ताराचंद जी भी आए थे।वो स्वतः संत थे वो पाखंड नहीं सिखाते थे बेशक वो कहते थे की मैं अनपढ़ हूँ बेशक वो कहते थे कि मुझे दो रोटी भी नसीब नहीं होती थी लेकिन हकीकत तो यह है की वो तो परा विधा के धनी थे वो तो लाखो भूखे पेटों को भरने वाले थे।उन्होंने कहा कि पहले योग्य बनो फिर इच्छा करो क्यूँकि बिना योग्यता के कुछ नहीं मिलता हुज़ूर ताराचंद जी को भी वही समझ सकता है जो योग्य है।संतों की गति गुप्त है इसे हर कोई नहीं जान सकता जिसने जान लिया उसने तो उस गढ़ को भी जीत लिया।हमने अपनी आँखो से देखा है कितने ज्ञानी ध्यानी गुरु महाराज जी के आगे नतमस्तक होते थे।गुरु महाराज जी ने दरमाया कि जैसे कितना ही अँधेरा हो सूर्य के निकलते ही अंधेरा नहीं टिक सकता कैसे ही संतों के प्रकट होने से अज्ञान भी नहीं टिकता।उन्होंने कहा कि संत अपने उसूलों पर चलते हैं।हनूर ताराचंद जी जे भी उसूल के पक्के थे उन्होंने जीवन के आखरी पल तक कमा कर खाया।अपने जीवन में कितने वृक्ष लगाए और अपनी पीठ पर पानी ढो कर पेड़ो को सींचा।उन्होंने अपना निवाला पहले दूसरे को खिलाया।उन्होंने कभी अधर्मी का अन्न नहीं खाया पूरा जीवन नशे से दूर रहे।वे महात्माओं के सेवा करते थे और अपने गुरु को सेवा देने के लिए उन्होंने अपने खाना खाने बर्तन तक को बेच दिया था।
हुजूर महाराज ने अपने गुरु के साथ बिताए पलों को भावकुता के साथ जीते हुए फ़रमाया कि मेरे गुरु के गुण किसी लेखनी में किसी बानी में नहीं समा सकते।वो जानी जान थे वे कुल मालिक के साक्षात अवतार थे और सर्वजन हिताये और सर्वजन सुखाये के सिद्धांत पर जीवन जीते थे ।हुजूर कँवर साहेब ने कहा कि संतों का जीवन इतर नहीं है संत चाहे किसी काल में हुए हो किसी स्थान पर आते हो सब का जीवन एक जैसा है सबका ध्येय एक होता है और वो है जीव कल्याण।गुरु महाराज ने मुक्ति की चार अवस्थाएँ हैं जिसमे पहली है सालोक्य मुक्ति यानि भक्त को मृत्यु के बाद भगवान के धाम या लोकमें स्थान प्राप्त होना।दूसरी है सामीप्य मुक्ति यानि सतगुरु के अत्यधिक निकट निवास करना और सान्निध्य पाना।तीसरी मुक्ति है सारूप्य मुक्ति यानि गुरु के समान ही दिव्यता प्राप्त हो जाना और चौथी है सायुज्य मुक्ति यानि शिष्य जब अपनी व्यक्तिगत पहचान को छोड़कर पूरी तरह से अपने गुरु के स्वरूप या उनके तेज में विलीन हो जाता है।गुरु महाराज जी ने कहा इंसान में हर यौनि का गुण है लेकिन ये उस की शिक्षा और सीख का असर होता है उसमे कौन सा गुण प्रधान होगा।दुनियादारी के लोग दुनियादारी की चीजों को चाहेंगे और प्रभु का प्यारा प्रभु को ही चाहेगा।उन्होंने कहा संत ताराचंद की प्रमुख शिक्षा में एक यही थी कि परमात्मा तो आपके रोम रोम में है लेकिन क्या हम उसे याद करते हो। याद करते तो विषय विकारो में नहीं फँसते याद करते तो नशों में नहीं उलझते। परमात्मा के प्यारे हो तो माँ बाप की सेवा करोगे बड़े बुजुर्गों का आदर करोगे बच्चों को संस्कार दोगे।प्रकृति परमात्मा का रूप है उसका मान करो उसके प्रति कृतज्ञता रखो।उन्होंने कहा कि हुजूर ताराचंद की संतान हो तो ये संकल्प ले कर जाओ कि कोई नशा नहीं करेंगे मांसाहार नहीं करेंगे और जरूरतमंद की सहायता करेंगे
इस अवसर पर हुजूर कँवर साहेब ने रक्तदान शिविर का भी शुभारंभ किया। इस अवसर पर सेवादारो ने 200 यूनिट रक्त का दान किया।इस अवसर पर हुजूर ने कहा कि अध्यात्म को सामाजिक रूप से परिपूर्ण व्यक्ति ही निभा सकता है।समाज की आधार इकाई हो तो इसे सवच्छ और सुदृढ बनाओ।अपनी संतान को बिगड़ने ना दो संतान को योग्य बनाओ क्यूँकि योग्यता ही उसे सब कुछ दिलाएगी।