Kanwar Saheb Ji Maharaj Dinod Satsang 2026: 'दुख ही नहीं, सुख में भी करें परमात्मा का स्मरण'; दिनोद में हुज़ूर कँवर साहेब जी ने दिया पावन संदेश
परमात्मा के प्रति विश्वास, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है करवाचौथ — परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज
दिनोद।।29.10.2026।।भारत की संस्कृति में व्रत-त्योहारों का विशेष महत्व है। करवाचौथ का त्योहार भी हमें परमात्मा के प्रति विश्वास, प्रेम और समर्पण का संदेश देता है।यह सत्संग वचन दिनोद गाँव में परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज ने फ़रमाये।करवाचौथ की शुभकामनाएँ देते हुए हुज़ूर कँवर साहेब जी ने कहा कि बेशक हमने इन व्रत-त्योहारों को किसी एक निर्धारित तिथि पर मनाना शुरू कर दिया है, लेकिन सत्य यह है कि इन त्योहारों के पीछे जो श्रद्धा, प्रेम, विश्वास और समर्पण का भाव है, वह सदैव हमारे भीतर विद्यमान रहता है।उन्होंने कहा कि परमात्मा के बिना हमारा कोई भी कार्य नहीं संवरता। वह परमात्मा ही है जो हमें जीवन प्रदान करता है और हर पल हमारा सहारा बनता है, फिर हम उसे केवल दुख और संकट के समय ही क्यों याद करें? सुख में भी परमात्मा का स्मरण करना चाहिए और प्रत्येक कार्य में उसकी कृपा के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। सच्ची भक्ति वही है, जिसमें मनुष्य का विश्वास परिस्थितियों के साथ न बदले। व्रत-त्योहार हमें अपनी दिनचर्या से कुछ समय निकालकर आत्मचिंतन करने, अपने रिश्तों की अहमियत समझने और जीवन में प्रेम, त्याग तथा सद्भाव को अपनाने की प्रेरणा देते हैं। यदि हमारे आचरण में दया, विनम्रता और परोपकार नहीं है, तो केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं से जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।
हुज़ूर कँवर साहेब महाराज जी ने संगत में बैठी सुहागिनों को करवाचौथ की कथा सुनाते हुए कहा कि इस व्रत का संदेश केवल पति की दीर्घायु की कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दांपत्य जीवन में अटूट विश्वास, प्रेम, निष्ठा और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का प्रतीक भी है। करवाचौथ की प्रचलित कथा में एक पतिव्रता स्त्री के दृढ़ संकल्प, प्रेम और विश्वास को दर्शाया गया है।उन्होंने कहा कि इन कथाओं का मूल भाव यह है कि जीवन में विश्वास के साथ विवेक, प्रेम के साथ धैर्य और समर्पण के साथ सत्य का होना भी जरूरी है।हुज़ूर महाराज जी ने समझाया कि जिस प्रकार करवाचौथ का व्रत अपने प्रिय के प्रति निष्ठा और विश्वास का प्रतीक है, उसी प्रकार मनुष्य के हृदय में परमात्मा के प्रति भी अटूट विश्वास होना चाहिए। जैसे सुहागिनें अपने पति की मंगलकामना के लिए व्रत रखती हैं, वैसे ही प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में सद्कर्म, संयम और सेवा का संकल्प लेना चाहिए। परमात्मा की भक्ति केवल शब्दों या कर्मकांडों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे व्यवहार और विचारों में भी दिखाई देनी चाहिए। परिवार में प्रेम, बड़ों का सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह और जरूरतमंदों की सहायता करना ही धार्मिक संस्कारों की वास्तविक पहचान है।हुज़ूर कँवर साहेब जी महाराज ने संदेश दिया कि व्रत-त्योहार तभी सार्थक होते हैं, जब वे हमारे जीवन में आध्यात्मिक जागृति लाएँ और हमें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा दें। परमात्मा को याद करने के लिए किसी विशेष दिन की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि हर दिन उसके प्रति कृतज्ञता, प्रेम और विश्वास के साथ जीवन जीना चाहिए।