भिवानी: पर्यावरण NOC न मिलने से अटका ₹60 करोड़ का सॉलिड वेस्ट प्लांट
भिवानी। शहर का ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्लांट पिछले करीब ढाई साल से पर्यावरण एनओसी के कारण अधर में लटका हुआ है। भिवानी, चरखी दादरी, लोहारू और बवानीखेड़ा से निकलने वाले कचरे के निस्तारण के लिए स्थापित यह प्लांट फिलहाल केवल दो प्रोसेसिंग यूनिट के सहारे ही आंशिक रूप से संचालित हो रहा है जबकि इसका करीब 80 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है।
जानकारी के अनुसार चारों शहरों से रोजाना करीब 250 से 275 टन कचरा दादरी रोड स्थित डंपिंग यार्ड पर पहुंच रहा है। यहां करीब 60 हजार टन पुराना कचरा भी वर्षों से जमा है जो अब पर्यावरण के लिए बड़ी समस्या बना हुआ है और इसका निस्तारण अभी बाकी है। पर्यावरण एनओसी के बिना प्लांट को पूर्ण रूप से संचालित नहीं किया जा सकता ऐसे में नगर परिषद की ओर से कंपनी को 60 प्रतिशत यानी 2350 रुपये प्रति टन के मुकाबले 1410 रुपये प्रति टन कचरा निस्तारण का भुगतान किया जा रहा है।
दादरी रोड स्थित नगर परिषद की करीब 24 एकड़ भूमि पर श्रीश्याम वेस्ट मैनेजमेंट कंपनी का ठोस अपशिष्ट प्लांट विकसित किया जा रहा है। करीब 60 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस प्लांट में चार से पांच प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जानी हैं जिनमें से फिलहाल केवल दो यूनिट ही कार्यरत हैं। इन दो यूनिटों के जरिये रोजाना लगभग सवा सौ से डेढ़ सौ टन कचरे का ही निस्तारण हो पा रहा है।
कंपनी की ओर से पर्यावरण एनओसी के लिए करीब ढाई साल पहले आवेदन किया गया था। इसके बाद दो बार केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को रिमाइंडर भी भेजे जा चुके हैं लेकिन अब तक एनओसी प्राप्त नहीं हुई है। हालांकि मंत्रालय की टीमें समय-समय पर प्रोसेसिंग यूनिटों के संचालन और कचरा निस्तारण प्रक्रिया का निरीक्षण करने आती रहती हैं। एनओसी के अभाव में प्लांट को पूर्ण क्षमता से चलाना संभव नहीं है अन्यथा पर्यावरण मंत्रालय की ओर से भारी जुर्माना लगाए जाने का खतरा बना रहता है। फिलहाल संचालित प्रोसेसिंग यूनिटें पर्यावरण मानकों के अनुरूप ही चलाई जा रही हैं।
नगर परिषद द्वारा कंपनी को केवल 60 प्रतिशत भुगतान किया जा रहा है जिसके चलते कंपनी को 40 प्रतिशत राशि का नुकसान उठाना पड़ रहा है। प्रोसेसिंग यूनिट के माध्यम से नया कचरा ही निस्तारण के दायरे में आ रहा है।
पुराने कचरे की दुर्गंध से भी बढ़ रही परेशानी, नए कचरे का निस्तारण
शहर के दादरी रोड स्थित डंपिंग यार्ड पर करीब डेढ़ दशक पुराना लगभग 125 हजार टन कचरा जमा था जिसमें से प्लांट में यूनिट स्थापित होने के बाद करीब 65 हजार टन कचरे का निस्तारण किया जा चुका है। जबकि अब भी लगभग 60 हजार टन पुराना कचरा खुले में पड़ा हुआ है जिसका निस्तारण अभी शेष है। मानसून के दौरान यह कचरा गीला होकर तेज दुर्गंध फैलाता है जिससे पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। डंपिंग यार्ड के आसपास के गांवों तक भी यह दुर्गंध पहुंचती है। ग्राम पंचायतों की ओर से पहले भी कचरा निस्तारण को लेकर पर्यावरण मानकों के पालन की मांग उठती रही है लेकिन पूर्ण प्लांट तैयार होने तक यह संभव नहीं है। प्लांट के पूरी तरह तैयार होने पर कचरे को शेड के नीचे डाला जाएगा जिससे दुर्गंध बाहर नहीं फैलेगी और बारिश में कचरा गीला भी नहीं होगा। फिलहाल प्रोसेसिंग यूनिट में केवल नया कचरा ही निस्तारित किया जा रहा है।
कंपनी की तरफ से करीब ढाई साल पहले पर्यावरण एनओसी के लिए आवेदन किया जा चुका है। इसके बाद कंपनी ने दो बार रिमाइंडर भी भेजा है। लेकिन किसी न किसी कारण से एनओसी नहीं हो पाई। फिलहाल पर्यावरण विभाग में चेयरमैन की नियुक्ति को लेकर मामला उलझा है। जैसे ही वहां कोई नियुक्ति होगी तो एनओसी का रास्ता भी साफ हो जाएगा।

