हरियाणा: रिटायर्ड फौजी की 'मेडल वाली चोट', 150 बच्चों को दे रहे मुफ्त कोचिंग
फौजी का जज्बा! हरियाणा के एक रिटायर्ड सैनिक ने बंदूक छोड़ थामी हैंडबॉल। 150 बच्चों को दे रहे मुफ्त ट्रेनिंग, रूढ़िवादी सोच को बदलकर बेटियों को बना रहे नेशनल चैंपियन।
कहते हैं कि फौजी कभी रिटायर नहीं होता, उसका सेवा करने का तरीका बदल जाता है। हरियाणा के एक रिटायर्ड फौजी ने इस कहावत को सच कर दिखाया है। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने बंदूक छोड़कर हाथ में हैंडबॉल थाम ली है और अब वे इलाके की पुरानी और रूढ़िवादी सोच पर 'मेडल की चोट' मार रहे हैं।
रिटायर्ड फौजी अब एक समर्पित हैंडबॉल कोच की भूमिका निभा रहे हैं। वे गांव और आसपास के इलाकों के लगभग 150 बच्चों को रोजाना मुफ्त (Free) ट्रेनिंग दे रहे हैं। उनके इस खेल मैदान पर न कोई फीस ली जाती है और न ही कोई भेदभाव होता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए यह कोच किसी मसीहा से कम नहीं हैं।
इस कहानी का सबसे सशक्त पहलू सामाजिक बदलाव है। जिस इलाके में लड़कियों का घर से निकलना या खेल के मैदान में शॉर्ट्स पहनकर खेलना वर्जित माना जाता था, वहां इस कोच ने अपनी मेहनत से बदलाव की नींव रखी। उन्होंने न केवल लड़कियों को हैंडबॉल खेलने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उनके माता-पिता को भी समझाया। आज उनके द्वारा प्रशिक्षित लड़कियां राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीत रही हैं। कोच का कहना है कि "जब बेटियां गले में मेडल डालकर लौटती हैं, तो विरोध करने वाली रूढ़िवादी सोच खुद-ब-खुद शांत हो जाती है।"
मैदान पर कोच का अनुशासन आज भी एक सैनिक जैसा ही है। वे बच्चों को केवल खेल ही नहीं, बल्कि जीवन में अनुशासन, समय की पाबंदी और देशप्रेम की शिक्षा भी देते हैं। अपनी पेंशन का एक हिस्सा वे अक्सर बच्चों के खेल उपकरणों (Balls, Nets, Shoes) पर खर्च कर देते हैं ताकि संसाधनों की कमी किसी खिलाड़ी का रास्ता न रोके। कोच का सपना है कि उनके इस छोटे से गांव के मैदान से निकलकर कोई बच्चा एक दिन ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करे। वे कहते हैं, "मैदान में पसीना बहाने वाला बच्चा कभी गलत रास्ते पर नहीं जाता। मेरा लक्ष्य नशा मुक्त और खेल युक्त युवा पीढ़ी तैयार करना है।"

