Kurukshetra Animal Health News: लम्पी वायरस से बचाव के लिए पशुपालन विभाग अलर्ट, गाहे-बगाहे सामने आ रहे मामले

पशुओं में फैल रहे लम्पी वायरस को लेकर पशुपालन विभाग ने एडवाइजरी जारी की है। जानें इसके लक्षण, बचाव और उपचार के तरीके।
 
veterinary doctor advice Kurukshetra

कुरुक्षेत्रः आजकल कई पशुओं में लम्पी वायरस का प्रकोप देखने को मिल रहा है. पशु चिकित्सकों की मानें तो अभी यह कम होता जा रहा है लेकिन फिर भी मामले सामने आ रहे हैं. हरियाणा, उत्तर प्रदेश सहित और कई राज्यों में इसका संक्रमण काफी ज्यादा है. इसको देखते हुए पशुपालन विभाग ने एडवाइजरी जारी की है ताकि इस वायरस से पशुओं का बचाव हो सके क्योंकि इस वायरस में पशु के स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ता है. संक्रमित पशुओं का दूध उत्पादन भी बहुत कम हो जाता है और कई बार ज्यादा समस्या गंभीर होने पर पशु की मौत भी हो जाती है. इसलिए समय रहते इसका नियंत्रण काफी जरूरी है.

वायरस के कारणः कुरुक्षेत्र के पशु चिकित्सक डॉ. विशाल ने बताया कि "लम्पी स्किन डिजीज मुख्य रूप से गायों और भैंसों में फैलने वाला एक संक्रामक वायरल रोग है, जो 'कैप्रिपोक्स' नाम के वायरस से होता है. यह मक्खी, मच्छर और किलनी जैसे खून चूसने वाले कीटों के जरिए एक पशु से दूसरे पशु में फैलता है."

लम्पी वायरस में प्रमुख लक्षणः पशु चिकित्सक डॉ. विशाल ने बताया कि "इसके लक्षण शरीर पर गर्दन, पीठ, थन और पैरों पर 2 से 5 सेमी व्यास की गोल और कठोर गांठें निकल आती हैं. संक्रमण के शुरुआत में पशु को 104°F से 106°F तक तेज बुखार आता है. पशु की आंखों और नाक से पानी या गाढ़ा स्राव बहने लगता है. दुधारू पशुओं के दूध में भारी गिरावट आती है. पैरों और निचले हिस्सों में सूजन आ जाती है, जिससे पशु को चलने में परेशानी होती है. पशु चारा खाना बंद या कम कर देता है और सुस्त होकर बैठ जाता है. समय के साथ गांठें फटकर घाव में बदलने लगती हैं."

संक्रमित पशु को अलग करें: बीमारी के लक्षण दिखते ही प्रभावित पशु को तुरंत स्वस्थ पशुओं के बाड़े से अलग रखें. समय पर या लम्पी की रोकथाम वाली वैक्सीन लगवाएं. मच्छर, मक्खी और किलनी को रोकने के लिए पशुशाला में नीम के पानी या सुरक्षित कीटनाशक का छिड़काव करें. बाड़े की नियमित सफाई करें और सोडियम हाइपोक्लोराइट फिनाइल से जगह को साफ रखें. प्रभावित क्षेत्रों से नए पशु न खरीदें और अपने पशुओं को खुले में चरने न भेजें. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए हरा चारा, गुड़ और खनिज मिश्रण दें.

प्राथमिक देखभालः घाव होने पर उन्हें लाल दवा (पोटैशियम परमैंगनेट) के पानी से धोएं और नीम का तेल या एंटीसेप्टिक मलहम लगाएं. पशु चिकित्सक की सलाह पर ही बुखार और दर्द निवारक दवाएं दें.

पशुपालकों के लिए सबसे जरूरी बात: लक्षण दिखने पर देरी न करें और संक्रमित पशु को तुरंत अलग करके पशु चिकित्सक से संपर्क करें.