Mastitis Treatment and Prevention: पशु के थन में सूजन और दूध में खून? जानिए थनैला रोग की पहचान और सटीक इलाज
बरसात में पशुओं में थनैला रोग (Mastitis) का खतरा बढ़ जाता है। जानिए कुरुक्षेत्र के पशु चिकित्सक से इसके लक्षण, कारण, सब-क्लिनिकल स्टेज और बचाव के उपाय।
कुरुक्षेत्रः बरसात का मौसम आते ही जहां पशुपालकों को हरे चारे की उपलब्धता से राहत मिलती है, वहीं दूसरी ओर पशुओं में संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. इन बीमारियों में सबसे घातक और आर्थिक रूप से नुकसानदेह बीमारी है थनैला रोग. थनैला मुख्य रूप से एक जीवाणु जनित रोग है, जो थन और अयन को प्रभावित करता है. यदि सही समय पर इसकी पहचान और रोकथाम न की जाए, तो पशु का दूध उत्पादन क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है.
15000 करोड़ का वार्षिक नुकसानः कुरुक्षेत्र के पशु चिकित्सक डॉ. रोहतास सैनी ने बताया कि थनैला रोग न केवल पशु के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि डेयरी उद्योग की कमर भी तोड़ देता है. आंकड़ों के अनुसार इस बीमारी के कारण देश में हर साल लगभग 15000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है. थनैला रोग से ग्रसित पशु के दूध उत्पादन में 50% से लेकर 100% तक की कमी आ सकती है. कई मामलों में इलाज में देरी होने पर पशु का एक, दो या चारों थन हमेशा के लिए बंद या खराब हो जाते हैं, जिससे पशु की बाजार में कीमत बहुत कम हो जाती है.
रोग के फैलने के मुख्य कारण: डॉक्टर रोहतास सैनी ने बताया कि बरसात में पशुशाला में कीचड़, जलजमाव और नमी के कारण बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं, जिसकी वजह से यह रोग जन्म लेता है. हवा और रोशनी की कमी वाले तंग बाड़ों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है. दूध निकालने के बाद थन के सुराख लगभग 30-40 मिनट तक खुले रहते हैं. यदि पशु तुरंत गंदी जगह पर बैठ जाता है, तो जमीन पर मौजूद बैक्टीरिया थन के रास्ते शरीर में प्रवेश कर जाते हैं.
बीमारी के लक्षण और अवस्थाएंः थनैला रोग को मुख्य रूप से दो अवस्थाओं में समझा जा सकता है.
प्रथम अवस्था-क्लिनिकल स्टेजः
- यह अवस्था बाहर से आसानी से दिखाई देती है.
- इसमें थन में सूजन, लालिमा और अत्यधिक दर्द होना.
- पशु को तेज बुखार आना और थन का बहुत गर्म हो जाना.
- दूध का रंग बदलना, दूध का फटना या उसमें छीछड़े/थक्के आना.
- गंभीर मामलों में दूध के साथ मवाद या खून आने लगता है.
दूसरी अवस्था सब-क्लिनिकल स्टेजः यह थनैला की सबसे खतरनाक अवस्था मानी जाती है क्योंकि इसमें बाहर से कोई लक्षण (सूजन या दर्द) नजर नहीं आते, लेकिन अंदर ही अंदर दूध का उत्पादन घटने लगता है और दूध की गुणवत्ता खराब हो जाती है. इस अवस्था की पहचान केवल लैब में दूध की जांच करवाकर ही की जा सकती है. किसानों को समय-समय पर अपने पशुओं के दूध का सैंपल लैब में जरूर जांच करवाना चाहिए.
बचाव और प्रबंधन के लिए पशु पालक क्या करेंः थनैला रोग के उपचार से बेहतर है इसका बचाव. पशुशाला का सही प्रबंधन ही इस बीमारी से बचने का सबसे कारगर उपाय है. पशुशाला को हमेशा साफ, सूखा और हवादार रखें. फर्श पर चूने का छिड़काव करें ताकि नमी और बैक्टीरिया समाप्त हो सकें. दूध निकालने के तुरंत बाद पशु को 40 मिनट तक बैठने न दें. इसके लिए दूध दुहने के तुरंत बाद पशु के आगे हरा चारा या दाना डाल दें, ताकि वह खड़ा होकर खाता रहे और इस दौरान थन के सुराख प्राकृतिक रूप से बंद हो जाएं. दूध निकालने के बाद थनों को एंटीसेप्टिक घोल (जैसे लाल दवा ) में डुबोएं. बीमारी का थोड़ा भी अंदेशा होने पर तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लें और एंटीबायोटिक दवाओं का पूरा कोर्स करवाएं, ताकि बीमारी क्रोनिक न बने.

