Mewat Culture News: मोबाइल और घटती हरियाली ने छीनी सावन की मिठास, मेवात में अब फीकी पड़ने लगी तीज की उमंग

मेवात में सावन और हरियाली तीज पर झूलों और लोकगीतों की पुरानी परंपरा धीरे-धीरे सिमट रही है। जानिए इसके मुख्य कारण।
 
लुप्त होती लोक संस्कृति

मेवात : सावन की फुहारों के साथ मौसम में ठंडक घुल गई है और पेड़ों पर हरियाली भी लौट आई है, लेकिन मेवात के अंचल में सावन की वह पुरानी रौनक अब दिखाई नहीं देती, जो कभी इस महीने की खास पहचान हुआ करती थी। हरियाली तीज के मौके पर जहां पहले पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ते थे और महिलाओं के सावन गीतों से गांव-मोहल्ले गूंज उठते थे, वहीं अब यह परंपरा धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।

कुछ दशक पहले सावन शुरू होते ही गांवों का माहौल पूरी तरह बदल जाता था। घरों के आंगन, चौपाल और खेतों की मेड़ों तक लोकगीतों की आवाज सुनाई देती थी। बड़े नीम और बरगद के पेड़ों पर रस्सियों के झूले डाले जाते थे। महिलाएं और युवतियां समूह में झूला झूलते हुए सावन के गीत गाती थीं। हरियाली तीज का पर्व इस उत्साह को और बढ़ा देता था। खासकर नवविवाहिताओं और युवतियों के लिए तीज का विशेष महत्व रहता था।

मोबाइल ने बदली त्योहारों की तस्वीर

समय के साथ त्योहार मनाने के तौर-तरीकों में भी बड़ा बदलाव आया है। व्यस्त जीवनशैली के कारण सामूहिक रूप से बैठने और पारंपरिक आयोजन करने का समय कम हो गया है। बच्चों और युवाओं के हाथों में मोबाइल ने काफी हद तक झूलों और लोकगीतों की जगह ले ली है। सावन के पारंपरिक गीतों की जगह अब सोशल मीडिया की रील और वीडियो अधिक दिखाई देते हैं।

घटती हरियाली से कम हुए झूले

सावन की लोक परंपराओं के कमजोर होने का एक कारण गांवों में घटती हरियाली भी है। पहले नीम, बरगद और अन्य घने पेड़ बड़ी संख्या में मौजूद थे, जिनकी मजबूत डालियों पर झूले आसानी से डाले जाते थे। बढ़ते शहरीकरण और निर्माण कार्यों के चलते पुराने पेड़ों की संख्या कम हुई है। पेड़ों के घटने के साथ ही झूलों की परंपरा भी कमजोर पड़ती गई।

नई पीढ़ी से दूर होती लोक संस्कृति

बुजुर्गों का मानना है कि नई पीढ़ी के लिए सावन अब मुख्य रूप से बारिश का मौसम बनकर रह गया है। पारंपरिक सावन गीतों, झूलों और सामूहिक उत्सवों की जानकारी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। ऐसे में लोक संस्कृति को बचाने के लिए परिवार और समाज की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि महिला मंडलों, सामाजिक संगठनों और युवा समूहों की ओर से सावन-तीज के सामूहिक आयोजन किए जाएं, पौधारोपण के साथ पारंपरिक झूले लगाए जाएं और बच्चों को लोकगीतों से जोड़ा जाए, तो इस पुरानी परंपरा को फिर से जीवंत किया जा सकता है।

सावन केवल बारिश और ठंडक का मौसम नहीं, बल्कि हमारी लोक संस्कृति, रिश्तों और सामूहिक खुशियों की पहचान भी है। जरूरत है कि आधुनिकता के साथ कदम मिलाते हुए अपनी इन पुरानी परंपराओं को भी सहेजा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी सावन की उस रौनक को महसूस कर सकें, जो कभी मेवात की पहचान हुआ करती थी।