PGIMER Medical Update: अल्जाइमर और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों की सटीक जांच के लिए पीजीआई में नई तकनीक की तैयारी

पीजीआईएमईआर में अल्जाइमर की शुरुआती और सटीक पहचान के लिए शुरू होगा बॉडी-फ्लूड टेस्ट पैनल। जानें पूरी डिटेल।
 
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चंडीगढ़: बार-बार चीजें भूलना, रोजमर्रा के काम करने में परेशानी होना या सोच और व्यवहार में बदलाव को केवल बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है. ऐसे लक्षण डिमेंशिया या अल्जाइमर जैसी बीमारियों से जुड़े हो सकते हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए PGIMER में अल्जाइमर की शुरुआती और अधिक सटीक पहचान के लिए नई जांच सुविधा शुरू करने की तैयारी है.

बॉडी-फ्लूड टेस्ट से बीमारी की पहचान: इस बारे में PGIMER के बायोकेमिस्ट्री विभाग की प्रो. इंदु वर्मा ने ईटीवी भारत को बताया कि, "संस्थान में जल्द ही अल्जाइमर की पहचान के लिए बॉडी-फ्लूड टेस्ट का विशेष पैनल शुरू किया जाएगा. इन जांचों के जरिए बीमारी से जुड़े संकेतों का अधिक सटीक तरीके से मूल्यांकन किया जा सकेगा. इससे डॉक्टरों को मरीज की स्थिति समझने और आगे की उपचार रणनीति तय करने में मदद मिलेगी."

शुरुआती जांच से इलाज की दिशा तय होगी: प्रो. इंदु वर्मा ने आगे कहा कि, "अल्जाइमर की शुरुआती पहचान के लिए बॉडी-फ्लूड टेस्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. इन जांचों से बीमारी की पहचान के साथ उपचार के प्रभाव की निगरानी में भी मदद मिलेगी. बीमारी जितनी जल्दी पहचानी जाती है, मरीज की देखभाल और उपलब्ध उपचार विकल्पों को लेकर उतनी ही बेहतर योजना बनाई जा सकती है."

हर भूलने की वजह अल्जाइमर नहीं: प्रो. इंदु वर्मा ने बताया कि, "याददाश्त कमजोर होने या सोचने-समझने की क्षमता में बदलाव के पीछे केवल अल्जाइमर ही कारण नहीं होता. डिमेंशिया कई अलग-अलग बीमारियों और स्थितियों से जुड़ा हो सकता है. इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय सही कारण की पहचान जरूरी है. नई जांच सुविधा इसी प्रक्रिया को अधिक सटीक बनाने में मदद कर सकती है."

इलाज का असर भी जांच सकेंगे डॉक्टर:PGIMER के बायोकेमिस्ट्री विभाग की प्रो. इंदु वर्मा ने जांच को लेकर कहा कि, "बॉडी-फ्लूड टेस्ट का उपयोग सिर्फ बीमारी की पहचान तक सीमित नहीं रहेगा. इन जांचों के जरिए उपचार के दौरान मरीज की स्थिति में होने वाले बदलावों पर भी नजर रखने में मदद मिल सकती है. इससे डॉक्टरों को यह समझने में सहायता मिल सकती है कि उपचार का मरीज पर किस तरह असर हो रहा है और आगे की निगरानी किस तरीके से की जानी चाहिए."

नई दवाओं के दौर में बढ़ी शुरुआती जांच की जरूरत: अल्जाइमर के उपचार के क्षेत्र में नई डिसीज-मॉडिफाइंग मेडिसिन्स उपलब्ध होने के साथ शुरुआती पहचान पर जोर बढ़ा है. प्रो. इंदु वर्मा ने बताया कि, "लगातार भूलने, परिचित कामों को करने में परेशानी या संज्ञानात्मक क्षमता में बदलाव को सामान्य उम्र संबंधी समस्या मानकर छोड़ना उचित नहीं है. ऐसे लक्षण लगातार बने रहें तो चिकित्सकीय जांच जरूरी है. PGIMER का न्यूरोलॉजी विभाग डिमेंशिया के मरीजों के लिए उपचार व्यवस्था को भी अधिक व्यवस्थित करने की दिशा में काम कर रहा है. विभाग की योजना मरीज को जांच से लेकर उपचार और फॉलोअप तक बेहतर तरीके से जोड़ने की है. इसके साथ मरीजों और उनके परिवारों के लिए पेशेंट सपोर्ट प्रोग्राम शुरू करने की तैयारी भी है."

परिवारों को बीमारी समझने में मिलेगी मदद: प्रो. इंदु वर्मा ने बताया कि, "सपोर्ट प्रोग्राम के जरिए मरीजों के परिवारों को बीमारी की प्रकृति, देखभाल और उपचार प्रक्रिया को समझने में सहायता देने की योजना है. विशेषज्ञों का कहना है कि डिमेंशिया की चुनौती से निपटने में केवल दवाएं पर्याप्त नहीं हैं. मरीज की नियमित निगरानी के साथ परिवार और देखभाल करने वालों को भी उचित मार्गदर्शन मिलना जरूरी है."

न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों की जांच होगी मजबूत: PGIMER में प्रस्तावित बॉडी-फ्लूड टेस्ट पैनल अल्जाइमर के साथ अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव डिजीज की जांच क्षमता को भी मजबूत कर सकता है. आधुनिक जांच तकनीकों के जरिए बीमारी की पहचान, मरीज की स्थिति का आकलन और उपचार की निगरानी को अधिक वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाने की संभावना है.

लक्षण दिखें तो जांच में देरी न करें: प्रो. इंदु वर्मा ने कहा कि, "उम्र बढ़ने के साथ कुछ सामान्य भूलने की समस्या हो सकती है, लेकिन जब याददाश्त में बदलाव रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. समय पर डॉक्टर से सलाह लेकर सही कारण की जांच कराना जरूरी है. नई जांच सुविधा शुरू होने के बाद PGIMER में ऐसे मरीजों के मूल्यांकन की प्रक्रिया को और मजबूती मिलने की उम्मीद है."