डेरा हिंसा केस: हाईकोर्ट से 4 आरोपियों को बड़ी राहत, बरी करने का फैसला बरकरार

2017 डेरा हिंसा केस में हाईकोर्ट ने चार आरोपियों को बरी करने का फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा- अभियोजन पक्ष साक्ष्य जुटाने और आरोपियों की पहचान साबित करने में विफल रहा।

 
कलायत आगजनी केस

पंचकूला: साध्वी यौन शोषण मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह को अगस्त 2017 में दोषी ठहराया गया था. जिसके बाद भड़की हिंसा के दौरान कैथल के कलायत स्थित उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड (यूएचबीवीएन) कार्यालय में तोड़फोड़ और आगजनी हुई थी. इस मामले में हाई कोर्ट ने चार आरोपियों को बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है. हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों की पहचान, घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी और अपराध के आवश्यक कानूनी तत्वों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है.

हर मोर्चे पर जांच विफल: जस्टिस विनोद एस भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को मामूली विसंगतियों के आधार पर बरी नहीं किया, बल्कि फैसला गंभीर विरोधाभासों, महत्वपूर्ण चूकों, संदिग्ध बरामदगियों, विश्वसनीय पहचान के अभाव, असंगत जांच, फोरेंसिक पुष्टि न होने और कई आरोपों के आवश्यक कानूनी तत्व सिद्ध नहीं होने पर आधारित है.

कोर्ट के आदेश को चुनौती: राज्य सरकार ने 23 सितंबर 2019 को कैथल के सत्र न्यायालय द्वारा धर्मपाल, जसबीर, शिव कुमार उर्फ बब्बर और बलबीर को भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए (राजद्रोह), 188, 427, 436, 450, 120-बी, धारा 34 और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम की धाराओं 3 व 4 के तहत बरी करने के आदेश को चुनौती दी थी. अभियोजन के अनुसार 25 अगस्त 2017 को 14-15 लोगों की भीड़ लाठी, डंडे, गंडासी और पेट्रोल की बोतलें लेकर राम रहीम के समर्थन में नारे लगाते हुए यूएचबीवीएन कार्यालय पहुंची. कर्मचारियों के वहां से भागने के बाद कार्यालय में तोड़फोड़ कर आग लगाई गई. जांच के दौरान पुलिस ने चार मोटरसाइकिल जब्त करने और आरोपियों की निशानदेही पर पेट्रोल की बोतलें व हथियार बरामद करने का दावा किया था.

'एफआईआर में नाम-गवाह और बरामदगी नहीं': हाई कोर्ट ने पाया कि एफआईआर में किसी भी आरोपी का नाम नहीं था और कोई गवाह भी घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी साबित नहीं कर सका. बलबीर सिंह के खिलाफ मामला केवल सह-आरोपी के खुलासे के बयान पर आधारित था, जिससे कोई आपत्तिजनक बरामदगी नहीं हुई. वहीं, शिव कुमार का नाम ना मूल शिकायत में था और ना ही जांच के दौरान दर्ज बयान में था. अदालत ने ये भी कहा कि प्रमुख गवाह के बयान पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसने अलग-अलग बयान दिए. इसके अलावा गवाह आरोपियों को पहले से नहीं जानते थे, बावजूद इसके टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) नहीं कराई गई, जिससे अदालत में की गई पहचान का साक्ष्य कमजोर हो गया.

फॉरेंसिक रिपोर्ट में कमजोर पड़ा मामला: खंडपीठ ने उस फोरेंसिक रिपोर्ट का उल्लेख भी किया, जिसमें जले हुए सामान पर पेट्रोल, डीजल, मिट्टी के तेल या उनके अवशेष नहीं मिले. अदालत ने कहा कि इससे अभियोजन का मामला भौतिक रूप से कमजोर पड़ता है. राजद्रोह के आरोप को अस्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कहा कि हिंसक प्रदर्शन दंगा हो सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर ये नहीं माना जा सकता कि सरकार के प्रति घृणा या अवमानना फैलाने का प्रयास किया गया. लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार या शासन के अंगों के खिलाफ नारेबाजी मात्र से नागरिकों पर राजद्रोह का आरोप नहीं लगाया जा सकता. अदालत ने कहा कि अभियोजन केवल इस संदेह से आगे नहीं बढ़ सका कि आरोपी "शायद" घटना में शामिल थे.