High Court Verdict: नाबालिग से दरिंदगी पर बड़ा फैसला, पीड़ित की उम्र जितनी कम, सजा उतनी ही कठोर
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का कड़ा रुख: बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में 'पीड़ित की उम्र' तय करेगी सजा का पैमाना। कम उम्र की बच्चियों से दरिंदगी पर मिलेगी उम्रकैद जैसी कठोरतम सजा।
चंडीगढ़: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने नाबालिगों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराधों पर लगाम लगाने के लिए एक बड़ा और कड़ा कानूनी सिद्धांत स्थापित किया है। कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन शोषण के मामलों में सजा का पैमाना केवल अपराध की प्रकृति नहीं, बल्कि 'पीड़ित की उम्र' भी होगी। अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि "पीड़ित की उम्र जितनी कम होगी, दोषी को मिलने वाली सजा उतनी ही अधिक और कठोर होनी चाहिए।"
जस्टिस की पीठ ने समाज में बच्चों की सुरक्षा को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि एक छोटे बच्चे के साथ किया गया कुकृत्य केवल शारीरिक हमला नहीं है, बल्कि यह उसके आने वाले पूरे जीवन और मानसिक स्वास्थ्य पर एक गहरा आघात है। कोर्ट ने माना कि बहुत कम उम्र की बच्चियों के साथ होने वाली दरिंदगी उनके कोमल मानस को इस कदर झकझोर देती है कि वह कभी उस सदमे से बाहर नहीं आ पातीं। इसलिए, ऐसे मामलों में अपराधी के प्रति किसी भी तरह की उदारता दिखाना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा।
अदालत ने निचली अदालतों के लिए एक दिशा-निर्देश तय करते हुए कहा कि सजा सुनाते समय अपराधी की उम्र या उसकी पारिवारिक स्थिति को देखने के बजाय इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि पीड़ित बच्चा कितना असहाय और मासूम था।
कठोरतम सजा का प्रावधान
कोर्ट ने संकेत दिया कि अत्यंत छोटी उम्र की पीड़ितों के मामले में कानून में मौजूद अधिकतम सजा (जैसे उम्रकैद) देने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह फैसला भविष्य में पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत चल रहे सैकड़ों मामलों में सजा के निर्धारण के लिए एक मिसाल बनेगा।
क्यों जरूरी था यह सख्त रुख?
अक्सर देखा गया है कि कानूनी प्रक्रियाओं और लंबी सुनवाई के दौरान कई बार दोषियों को 'उचित सजा' नहीं मिल पाती। हाई कोर्ट ने इस फैसले के जरिए यह संदेश दिया है कि अपराधियों में खौफ: मासूमों को निशाना बनाने वालों के मन में कानून का डर पैदा करना अनिवार्य है। सजा की गंभीरता ऐसी होनी चाहिए जो पीड़ित के दर्द और उसके छीने गए बचपन के साथ न्याय कर सके। बच्चों के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए "जीरो टॉलरेंस" की नीति अपनाना समय की मांग है।
न्यायिक संदेश: समाज की सुरक्षा सर्वोपरि
हाई कोर्ट ने अपने फैसले के अंत में यह भी स्पष्ट किया कि समाज का नैतिक ताना-बना बनाए रखने के लिए न्यायपालिका का सख्त होना जरूरी है। सजा ऐसी होनी चाहिए जो न केवल अपराधी को दंडित करे, बल्कि समाज के अन्य लोगों के लिए एक कड़क सबक भी पेश करे। इस फैसले के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि नाबालिगों से जुड़े यौन अपराधों के मामलों में दोषियों को अब तक की सबसे सख्त सजाएं मिलेंगी।

