High Court On Custodial Interrogation: 'हिरासत में पूछताछ जांच एजेंसी का मूल्यवान अधिकार' - पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का सख्त फैसला
चंडीगढ़ : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने व्यावसायिक मात्रा में नशीले पदार्थ की सप्लाई के आरोपित को अग्रिम जमानत देने से इन्कार कर दिया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यावसायिक मात्रा के मामले में नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट (एनडीपीएस एक्ट) की धारा 37 की कड़ी शर्तें लागू होती हैं और आरोपित इन दोनों अनिवार्य शर्तों को पूरा करने में सफल नहीं रहा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अपराध में संदिग्ध की भूमिका तय करने के लिए जांच एजेंसी के पास हिरासत में पूछताछ एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जिसे असाधारण परिस्थितियों के अभाव में सीमित नहीं किया जाना चाहिए।जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह ने यह आदेश साहिल कुमार की याचिका पर सुनाया। याचिका थाना बिलासपुर, जिला यमुनानगर में 3 जून 2026 को दर्ज एफआइआर नंबर से संबंधित थी। आरोपित के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।
एफआइआर के अनुसार, पुलिस टीम विश्वसनीय सूचना के आधार पर गश्त कर रही थी। इसी दौरान हर्ष कमल उर्फ हैप्पी को काबू किया गया। उसके कब्जे से डाइसाइक्लोमाइन ट्रामाडोल हाइड्रोक्लोराइड एसीटामिनोफेन के 650 कैप्सूल बरामद हुए, जिनका वजन 362.5 ग्राम था। इसके अलावा 8.19 ग्राम हेरोइन भी बरामद की गई। पुलिस ने बरामद नशीले पदार्थ को जब्त और सील करने सहित अन्य कानूनी औपचारिकताएं पूरी कीं।जांच के दौरान सह-आरोपित हर्ष कमल ने कथित तौर पर अपने डिस्क्लोजर स्टेटमेंट में साहिल कुमार को नशीले पदार्थ का सप्लायर बताया। साहिल की ओर से दलील दी गई कि उसके कब्जे से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई और उसके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के मामले में कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
यह भी कहा गया कि उसके खिलाफ उपलब्ध एकमात्र सामग्री सह-आरोपित का हिरासत में दर्ज बयान है, जो साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है।राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि सह-आरोपित से बरामद नशीला पदार्थ व्यावसायिक मात्रा में आता है और साहिल पर ट्रामाडोल कैप्सूल की सप्लाई का आरोप है। इसलिए धारा 37 की दोनों शर्तें पूरी किए बिना जमानत नहीं दी जा सकती। हाई कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत देना न्यायिक विवेक का विषय है और यह सामान्य राहत नहीं है।
कोर्ट ने यह भी पाया कि साहिल पहले एनडीपीएस एक्ट और अन्य अपराधों में अभियोजित हो चुका है। ऐसे में उसका साफ-सुथरा आपराधिक रिकॉर्ड होने का दावा भी सही नहीं था। जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह ने कहा कि अपराध में संदिग्ध की भूमिका तय करने के लिए जांच एजेंसी के लिए हिरासत में पूछताछ मूल्यवान अधिकार है और मौजूदा मामले में ऐसा कोई असाधारण कारण नहीं है, जिसके आधार पर इस अधिकार को सीमित किया जाए। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने याचिका को गुणहीन मानते हुए अग्रिम जमानत की मांग खारिज कर दी।