संत कंवर साहेब महाराज: सत्संग से ही संभव है जीवन का कल्याण और प्रभु भक्ति

राधास्वामी आश्रम दिनोद में संत कंवर साहेब महाराज का दिव्य प्रवचन। जानें कैसे गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी प्रभु प्राप्ति और ईश्वर की ओर बढ़ना संभव है।

 
गृहस्थ जीवन और भक्ति

 राधास्वामी आश्रम दिनोद में आयोजित विशाल सत्संग में संत कंवर साहेब महाराज ने कहा कि ईश्वर की ओर बढ़ना ही सच्चे मानव जीवन की पहचान है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को गृहस्थ जीवन के सभी दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी प्रभु प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। ऐसा व्यक्ति न केवल अपने जीवन को सार्थक बनाता है बल्कि समाज और मानवता के कल्याण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कंवर साहेब महाराज ने साध-संगत को संबोधित करते हुए कहा कि मानव जीवन के हित और कल्याण का वास्तविक मार्ग सत्संग से होकर जाता है। मन में सब्र, संतोष और विवेक जागृत करने के लिए सत्संग अत्यंत आवश्यक है। सत्संग मनुष्य के जीवन की दिशा बदल देता है और उसके साथ-साथ अनेक अन्य लोगों के जीवन में भी कल्याण का कारण बनता है।

उन्होंने कहा कि अरबों-खरबों जीवों में से विरले ही ऐसे होते हैं जिन्हें परमात्मा के महल में प्रवेश का सौभाग्य प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन का प्रत्येक क्षण प्रभु प्राप्ति के लिए समर्पित करना चाहिए। यदि किसी कारणवश भक्ति कम भी हो जाए तब भी अपनी संगति कभी खराब नहीं होने देनी चाहिए क्योंकि अच्छी संगति ही मनुष्य को परमात्मा के मार्ग पर स्थिर रखती है।

उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य के भीतर वैराग्य उत्पन्न नहीं होता तब तक परमात्मा के प्रति सच्चा प्रेम जागृत नहीं हो सकता। गृहस्थ जीवन छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। संसार में अपने सभी कर्तव्यों का पालन करते हुए ईश्वर की ओर बढ़ना ही सच्चे मानव जीवन की पहचान है।

सत्संग की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि जैसे चुंबक लोहे को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है वैसे ही संत-महापुरुष अपने प्रेम, ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति से जीवात्माओं को परमात्मा की ओर आकर्षित कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि संसार में अनेक शक्तियां और आकर्षण मनुष्य को भक्ति के मार्ग से भटकाने का प्रयास करते हैं। ऐसे समय में मनुष्य के लिए यह निर्णय कठिन हो जाता है कि वह अपनी आंखों के सामने दिखाई देने वाले संसार का साथ दे या उस निराकार और अदृश्य परमात्मा का जो दिखाई नहीं देता।


उन्होंने कहा कि यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि परमात्मा निराकार होते हुए भी कण-कण में विद्यमान हैं। कंवर साहेब ने कहा कि कर्मकांड से मन को कुछ समय के लिए तुष्टि अवश्य मिल सकती है किंतु आत्मा की वास्तविक खुराक केवल सतगुरु की भक्ति और नाम-साधना से ही प्राप्त होती है। संतों की वाणी का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई आपका बुरा भी करे तो उसके प्रति भी भलाई का व्यवहार करें। किसी के कर्मों के ऋणी मत बनिए क्योंकि कर्मों का ऋण एक न एक दिन अवश्य चुकाना पड़ता है, चाहे युग ही क्यों न बदल जाए।

भक्ति कम हो जाए तो भी अच्छी संगति कभी न छोड़ें : कंवर साहेब महाराज ने कहा कि यदि किसी कारणवश भक्ति कम भी हो जाए तब भी मनुष्य को अपनी संगति कभी खराब नहीं होने देनी चाहिए क्योंकि अच्छी संगति ही उसे परमात्मा के मार्ग पर स्थिर रखती है। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य के भीतर वैराग्य उत्पन्न नहीं होता तब तक परमात्मा के प्रति सच्चा प्रेम जागृत नहीं हो सकता।