हरियाणा: प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, हर जिले में बनेगी 'प्रेरक किसान कमेटी'
हरियाणा सरकार का प्राकृतिक खेती पर बड़ा फैसला। हर जिले में बनेगी 'प्रकृति श्री अन्न प्रेरक किसान कमेटी'। सीएम सैनी ने कहा- हैफेड करेगा प्राकृतिक उपज की खरीद।
पंचकूला: मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बुधवार एक बड़ा फैसला किया. उन्होंने कहा कि प्रदेश में प्रकृति श्री अन्न प्रेरक किसान कमेटी बनाई जाएगी, जो हर जिले में होगी. इस कमेटी का मुख्य कार्य किसानों से संपर्क करना, उनके फार्म पर जाना और सरकार से सामंजस्य करवाकर प्राकृतिक खेती के साथ जोड़ने का काम होगा. ये एक तरह से प्राकृतिक खेती के प्रेरक एम्बेस्डर होंगे.
प्राकृतिक खेती करने पर सहयोग: मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने ये फैसला पंचकूला में हरियाणा कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा आयोजित प्राकृतिक खेती संवाद को संबोधित करते समय सुनाया. उन्होंने किसानों से संवाद भी किया और उनसे मिले सुझावों को जल्द पूरा करवाने की दिशा में काम करने का आश्वासन दिया. साथ ही कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए कि प्राकृतिक खेती करने वाले जिन किसानों ने गाय खरीदने के लिए सब्सिडी के लिए आवेदन किया है, उन्हें सब्सिडी जारी की जाए.
प्राकृतिक खेती से सुरक्षित भविष्य: मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि "प्राकृतिक खेती केवल खेती करने का एक तरीका नहीं, बल्कि किसान, प्रकृति और समाज के बीच टूट चुके संबंधों को फिर से मजबूत करने का अभियान है. ये धरती माता की सेवा, खेती की लागत कम करने, जल और मिट्टी के संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का माध्यम है. उन्होंने किसानों से प्राकृतिक खेती के ब्रांड एंबेसडर बनने का आह्वान करते हुए कहा कि अब केवल चिंतन नहीं, बल्कि अमल करने और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करने का समय है."
हर महीने संवाद कार्यक्रम का आयोजन: मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार समय-समय पर किसानों से सीधा संवाद करेगी और प्राकृतिक खेती के इस अभियान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास किए जाएंगे. उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि प्राकृतिक खेती पर प्रत्येक माह संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएं. उन्होंने कहा कि बड़े सेमिनारों में गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत को भी आमंत्रित किया जाएगा, ताकि किसान उनके अनुभवों से लाभान्वित हो सकें.
सीएम ने कहा कि "आज का सेमिनार केवल प्राकृतिक खेती की तकनीक सीखने का अवसर नहीं है, बल्कि किसान और प्रकृति के बीच सदियों पुराने अटूट रिश्ते को फिर से मजबूत करने का अभियान है. पहले खेती का संबंध धरती माता और गौ माता से था. यही संबंध किसान के जीवन में समृद्धि और खुशहाली लेकर आता था. लेकिन समय के साथ ये रिश्ता कमजोर हुआ और आज प्राकृतिक आपदाएं और पर्यावरणीय संकट बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं."
हर सीजन 20-25 फुट नीचे जा रहा जलस्तर: मुख्यमंत्री ने कहा कि "मानव ने विकास तो किया है लेकिन कहीं ना कहीं धरती का अत्यधिक दोहन भी किया है. आज सवाल ये नहीं है कि खाद और कीटनाशकों की कमी है, बल्कि ये है कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी धरती और कैसा पर्यावरण छोड़कर जा रहे हैं. पूर्वज हमें भरपूर भूजल और उपजाऊ मिट्टी देकर गए थे. लेकिन आज कई क्षेत्रों में भूजल स्तर हर सीजन में 20 से 25 फुट तक नीचे जा रहा है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. पहले श्रमिक मंडियों में अनाज की भारी-भरकम बोरियां आसानी से उठा लेते थे, लेकिन आज बदलती जीवनशैली, रासायनिक खेती और प्राकृतिक असंतुलन के कारण सभी के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. इसलिए खेती की दिशा बदलना समय की आवश्यकता है."
प्रधानमंत्री का स्पष्ट विज़न: मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट विजन है कि प्राकृतिक खेती 21वीं सदी की आवश्यकता है. ये केवल खेती की नई पद्धति नहीं, बल्कि धरती बचाने का अभियान है. ये किसानों की लागत कम करने, पर्यावरण संरक्षण करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए समृद्ध भारत बनाने का माध्यम है. भारतीय संस्कृति में धरती को मां का दर्जा दिया गया है और उसकी सेवा करना सभी का कर्तव्य है.
किसान प्राकृतिक खेती के ब्रांड एंबेसडर बनें: मुख्यमंत्री ने किसानों से आह्वान किया कि वे प्राकृतिक खेती के एंबेसडर बनकर गांव-गांव लोगों को इसके लाभ बताएं. उन्होंने कहा कि केवल चर्चा करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि स्वयं भी प्राकृतिक खेती अपनानी होगी और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना होगा. उन्होंने कहा कि किसानों को नकली बीज और दवाइयां न मिले, इसे रोकने के लिए राज्य सरकार ने विधानसभा में कड़ा कानून बनाया है. अब यदि कोई किसान को नकली बीज बेचते हुए पाया जाता है तो उसे पांच वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया है. उन्होंने कहा कि पीएम ने देशभर में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का अभियान शुरू किया है. हरियाणा सरकार ने भी किसानों से सुझाव लेकर तैयार किए गए राज्य बजट में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रावधान किया है.
हैफेड करेगा प्राकृतिक उपज की खरीद: मुख्यमंत्री नायब सैनी ने कहा कि "प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों की उपज की बिक्री में किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी जाएगी. सरकार ने पहले ही घोषणा की है कि प्राकृतिक खेती से तैयार उपज के लिए मंडियों में अलग स्थान उपलब्ध कराया जाएगा और हैफेड इसकी खरीद करेगा, जिसकी व्यवस्था की जा रही है. प्रदेश में क्षेत्रवार बागवानी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. गन्नौर मंडी में प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों के लिए अलग शेड बनाया गया है और राज्य में चार सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए गए हैं, जहां आधुनिक बागवानी और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है."
देसी और गुणवत्तापूर्ण बीज विकसित करने के निर्देश: सीएम ने कहा कि आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना कर रही है. मिट्टी की उर्वरता लगातार घट रही है और खेती की लागत बढ़ रही है. इसलिए कृषि वैज्ञानिकों को देसी और गुणवत्तापूर्ण बीज विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं. दुनिया के अनेक विकसित देश अब रासायनिक खेती से दूरी बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि भारत के पास ऋषि-मुनियों की परंपरा, किसानों का अनुभव और प्राकृतिक खेती का समृद्ध ज्ञान पहले से मौजूद है. मुख्यमंत्री ने कहा कि विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में प्राकृतिक खेती सबसे मजबूत स्तंभ साबित होगी. इसके लिए सरकार और किसानों को मिलकर जन आंदोलन के रूप में इस अभियान को आगे बढ़ाना होगा.
किसान आत्मनिर्भर और कर्जमुक्त बनेंगे: हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्याम सिंह राणा ने कहा कि प्राकृतिक खेती किसानों को कर्जमुक्त, आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाने का प्रभावी माध्यम है, जबकि रासायनिक खेती किसानों की लागत बढ़ाकर उन्हें कर्ज की ओर धकेलती है. राज्य सरकार किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए प्राकृतिक खेती को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दे रही है. उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा लागू की जाने वाली प्रत्येक योजना और नीति जनकल्याण को केंद्र में रखकर तैयार की जाती है. नई पहल का प्रारंभिक स्तर पर विरोध होना स्वाभाविक है लेकिन किसानों को ये समझना चाहिए कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का उद्देश्य उनकी आय बढ़ाना, खेती की लागत घटाना और कृषि को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बनाना है.
किसान आर्थिक रूप से बनेंगे सशक्त: मंत्री राणा ने कहा कि "रासायनिक खेती में किसानों की कमाई का बड़ा हिस्सा उर्वरक, कीटनाशक और अन्य कृषि रसायन बनाने वाली कंपनियों के पास चला जाता है. इसके विपरीत प्राकृतिक खेती में बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत घटती है और किसान आर्थिक रूप से सशक्त बनता है. वर्तमान में रासायनिक, जैविक और प्राकृतिक खेती की तीन प्रमुख पद्धतियां प्रचलित हैं. जैविक खेती में अधिक मात्रा में गोबर एवं अन्य संसाधनों की आवश्यकता होती है, जबकि प्राकृतिक खेती कम लागत वाली, आत्मनिर्भर और पर्यावरण अनुकूल खेती की प्रणाली है. इसी कारण राज्य सरकार प्राकृतिक खेती के विस्तार के लिए निरंतर प्रयास कर रही है."
प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ाने का लक्ष्य: मंत्री ने कहा कि "पर्यावरण संरक्षण, भूमि की उर्वरता बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिए प्राकृतिक खेती समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है. विकसित भारत के संकल्प के अनुरूप वर्ष 2047 तक देश में प्राकृतिक खेती का दायरा 20 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है." उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि प्राकृतिक खेती की शुरुआत अपने पशुओं के चारे से करें और चारे के उत्पादन में भी कीटनाशकों के उपयोग से बचें. उन्होंने कहा, वह स्वयं एक किसान हैं और खेती से जुड़ी चुनौतियों व किसानों की जरूरतों को भली-भांति समझते हैं.
प्राकृतिक खेती को समझना जरूरी: इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील किसान धर्मपाल यादव ने कहा कि कृषि करना और कृषि को समझना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. प्रकृति की धारा को समझकर उसके अनुरूप चलना या उसे सकारात्मक दिशा देना ही वास्तविक कृषि ज्ञान है. यदि खेती को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाएगा तो उसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों की अनदेखी होगी. उन्होंने कहा कि वर्ष 1907 में भूजल स्तर उस गहराई पर था, जहां वह सदियों से बना हुआ था. लेकिन रासायनिक खेती के बढ़ते प्रयोग से आज भूजल स्तर कई फीट नीचे चला गया है. इसके साथ ही पर्यावरण भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है. बढ़ता प्रदूषण भी आज एक बड़ी समस्या है.
उन्होंने कहा कि "रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों के चलते आज अस्पतालों की संख्या बढ़ रही है और लोगों में गंभीर बीमारियां भी बढ़ी हैं. अब दुनिया भी प्राकृतिक खेती की ओर लौटने की आवश्यकता महसूस कर रही है और बड़े शहरों से लोग गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं. प्राकृतिक खेती का अपना एक वैज्ञानिक तंत्र है, जिसे समझना आज हर किसान के लिए आवश्यक है. कीट प्रबंधन के लिए भी प्राकृतिक उपाय पर्याप्त हैं और रासायनिक दवाइयों पर निर्भरता कम करनी चाहिए. उन्होंने किसानों के साथ अपने उत्पादों के विपणन (मार्केटिंग) मॉडल की जानकारी साझा की और प्राकृतिक खेती से बेहतर आय प्राप्त करने के अपने अनुभव बताए."
प्राकृतिक खेती के लिए सुझाव: कार्यक्रम के दौरान किसानों ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के समक्ष प्राकृतिक खेती को अधिक से अधिक बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा किए जा सकने वाले विभिन्न सुझाव साझा किए. किसानों ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा स्वयं किसानों के साथ आमने-सामने बैठकर संवाद करना उनके लिए अत्यंत प्रेरणादायक है. सीधे संवाद से किसानों का मनोबल बढ़ता है और उन्हें ये विश्वास मिलता है कि राज्य सरकार उनके हितों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है. किसानों ने राज्य सरकार की किसान हितैषी नीतियों और किसानों के कल्याण के लिए जारी प्रयासों की सराहना की.

