Basmati Export Crisis: ईरान-इजराइल जंग से करनाल का बासमती निर्यात ठप, मिलर्स को भारी नुकसान
ईरान-इजराइल युद्ध के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से हरियाणा का बासमती निर्यात संकट में। शिपिंग रूट बाधित होने से करनाल की राइस मिलों पर तालाबंदी का खतरा।
करनाल: मिडल ईस्ट में ईरान और इजराइल के बीच छिड़ी जंग का सीधा असर अब हरियाणा के खेतों और करनाल की राइस मिलों तक पहुंच गया है। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण बासमती चावल की सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है। हरियाणा देश के कुल बासमती निर्यात का अकेले 40 प्रतिशत हिस्सा संभालता है, लेकिन वर्तमान हालात ने व्यापारियों की नींद उड़ा दी है। राइस मिलर दिनेश गुप्ता के मुताबिक, खाड़ी देशों को जाने वाला 70 प्रतिशत चावल इसी रूट से गुजरता है, जो अब पूरी तरह असुरक्षित हो चुका है।
शिपिंग रूट बाधित होने से जहाजों को इमरजेंसी में दूसरे बंदरगाहों पर अपना माल डंप करना पड़ रहा है। व्यापारियों का कहना है कि जो माल 28 फरवरी से पहले चला था, वह भी अब तक अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच पाया है। इससे कंटेनर चार्ज, ग्राउंड रेंट और समुद्री जहाज का किराया बेतहाशा बढ़ गया है। दिनेश गुप्ता बताते हैं कि इस बिजनेस में महज 2 से 3 प्रतिशत का मुनाफा होता है, जबकि वर्तमान में खर्च 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। ऐसे में निर्यातकों को अपनी जेब से भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
युद्ध की अनिश्चितता ने न केवल सप्लाई बल्कि पेमेंट चक्र को भी जाम कर दिया है। करनाल के चावल व्यापारी अमित बंसल का कहना है कि खाड़ी देशों से नए ऑर्डर मिलने लगभग बंद हो गए हैं और पुराने माल की पेमेंट भी बीच में फंसी हुई है। साल 2025-26 में भारत ने 6 मिलियन टन बासमती निर्यात का रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन इस बार लक्ष्य पार करना तो दूर, मौजूदा स्थिति को संभालना भी मुश्किल हो रहा है। अगर यह तनाव जल्द समाप्त नहीं हुआ, तो मिलर्स को अपनी प्रोडक्शन यूनिट्स बंद करनी पड़ सकती हैं।
फिलहाल राइस मिलों में काम चल रहा है, लेकिन उत्पादन की गति काफी धीमी पड़ गई है। व्यापारियों ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध लंबा चला, तो मिलें बंद होने से लाखों मजदूरों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो जाएगा। केंद्र और राज्य सरकार से लगातार बातचीत जारी है ताकि निर्यातकों को इस वैश्विक संकट से उबारने के लिए कोई वित्तीय सहायता या समाधान मिल सके। हरियाणा का बासमती न केवल खाड़ी देशों बल्कि यूरोप में भी अपनी धाक रखता है, जिसे बचाना अब सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।

