India Sleep Crisis 2025: भारत में गहराता नींद का संकट, कम सोने से दिमाग और सेहत पर पड़ रहा बुरा असर
बस एक एपिसोड और.. बस एक रील और, ये वो इच्छा है जो रात के 12 बजे शुरू होती है और कई बार घड़ी में दो-तीन भी बजा देती है. फिर सुबह अलार्म बजता है, आंखें खुलती हैं लेकिन दिमाग नहीं. बेंगलुरु के एक टेक पार्क में काम करने वाले 26 साल के राहुल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. रात 2 बजे सोना, सुबह 7 बजे उठना और फिर वीकेंड पर 10-12 घंटे सोकर हफ्ते भर की नींद पूरी करने की कोशिश. लेकिन शरीर के लिए नींद कोई ऐसा कर्ज़ नहीं है जिसे शनिवार-रविवार को एक साथ चुकाया जा सके.
भारत में कितना बड़ा नींद का संकट?
कम्युनिटी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकलसर्कल्स के साल 2025 के सर्वे हाउ इंडिया स्लीप्स में 348 जिलों से 43 हजार से ज्यादा लोगों से बात की गई. 59% लोगों ने माना कि उन्हें रात में 6 घंटे से भी कम की लगातार नींद हो पा रही है. इनमें 39% लोगों ने 4 से 6 घंटे और 20% लोगों ने 4 घंटे तक की नींद लेने की बात मानी.बात सिर्फ देर रात तक जागने की नहीं है. बात ये है कि बड़ी तादाद में लोगों की नींद पूरी ही नहीं हो रही.
होम और स्लीप सॉल्यूशन कंपनी वेकफिट के ग्रेट इंडियन स्लीप स्कोरकार्ड 2025 ने पांच हजार लोगों के बीच सर्वे किया. 58% भारतीयों ने बताया कि वो रात 11 बजे के बाद सोते हैं. 44% ने कहा कि सुबह उठने के बाद वे फ्रेश महसूस नहीं करते. मामला सिर्फ नींद या बिस्तर पर बिताए घंटों का भी नहीं है. सवाल ये है कि नींद कितनी बेफिक्र और आराम देने वाली थी.
बिंज वॉचिंग और स्क्रॉलिंग में फंसा ब्रेन
अब हर मनोवैज्ञानिक रात में सोने से कम से कम एक घंटा पहले फोन या टीवी बंद करने की सलाह देते हैं. क्योंकि बस 10 मिनट का स्क्रॉल आधे घंटे या एक घंटे में बदल जाता है.
स्क्रीन पर लगातार बदलता कंटेंट ब्रेन एक्टिव रख सकता है और नींद को आगे खिसका सकता है. नेशनल स्लीप फाउंडेशन की 2024 की कंसेंसस स्टेटमेंट में एक्सपर्ट्स ने स्क्रीन, कंटेंट और सोने से पहले स्क्रीन लाइट के इफेक्ट पर रिसर्च की समीक्षा की. इसमें बच्चों और टीनएजर्स पर स्क्रीन के इस्तेमाल और नींद के बीच नुकसान का कंसेंसस मिला.
कम नींद मतलब स्लो दिमाग
अमेरिका की नेशनल हेल्थ एजेंसी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी सीडीसी कहती है कि 18 से 60 साल के वयस्कों को आम तौर पर हर रात कम से कम 7 घंटे की नींद चाहिए. लगातार कम नींद का असर वर्क एबिलिटी और हेल्थ पर पड़ सकता है.
ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरनमेंट मेडिसिन में प्रकाशित ए. एम. विलियमसन और ए. एम. फेयर की स्टडी बताती है कि 17 से 19 घंटे तक लगातार जागे रहने के बाद कुछ टेस्ट में प्रदर्शन 0.05% ब्लड अल्कोहल कंसंट्रेशन के बराबर या उससे भी खराब था. कुछ टेस्ट में लोगों के रिएक्ट और रिस्पांस करने की स्पीड 50% तक धीमी हुई.
वीकेंड की 12 घंटे वाली नींद
राहुल की तरह बहुत से लोग सोचते हैं कि वीकेंड पर नींद की कमी को वीकेंड पर भरपूर सोकर ठीक किया जा सकता है. लेकिन 2025 के लोकलसर्कल्स सर्वे में 38% लोगों ने कहा कि वे वीकेंड या छुट्टी में भी अपनी नींद की कमी पूरी नहीं कर पाते.
इसलिए नींद की चाभी संडे देर तक सोना नहीं, रोज़ की नींद को रेग्युलेट करना है.
मेट्रो सिटी में जैसे-जैसे लोगों में अनरेस्ट, मेंटल हेल्थ इशू और दूसरी डिजीज़ बढ़ रही हैं, डॉक्टर भी नींद कितनी जरूरी है, इस पर फोकस कर रहे हैं.
रात का एक और एपिसोड, एक और रील या ऑफिस का एक और मेल कुछ मिनट बचा सकता है. लेकिन अगर इसकी भरपाई कम नींद से हो रही है, तो नेक्स्ट मॉर्निंग इसकी कीमत हमारा फोकस, मूड, वर्क कैपेसिटी और क्वालिटी चुकाती है. बॉडी और ब्रेन को फर्क नहीं पड़ता कि रात 2 बजे आप टीवी देख रहे थे या ऑफिस का काम कर रहे थे. उसे बस इतना पता है. सोने का समय निकल गया.