राहुल गांधी का 56वां जन्मदिन: 2029 की सियासी जंग और प्रधानमंत्री की रेस
राहुल गांधी के 56वें जन्मदिन पर सियासी चर्चाओं का बाजार गर्म। क्या राहुल गांधी 2029 में पीएम मोदी के सामने प्रधानमंत्री पद की बड़ी चुनौती होंगे? पढ़ें विशेष रिपोर्ट।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी का आज 56वां जन्मदिन है. 24-अकबर रोड पर जब वो केक काट रहे थे, तब उनके जेहन में 2029 का लोकसभा चुनाव जरूर घूम रहा होगा. जन्मदिन से ठीक एक दिन पहले ही राहुल ने दावा किया था कि पीएम मोदी एक साल के भीतर कुर्सी छोड़ देंगे. उसी समारोह में कई मिनट तक राहुल गांधी को पीएम बनाओ के नारे भी गूंजे. अब बड़ा सवाल ये है कि मोदी के करिश्मे और INDIA गठबंधन में लीडरशिप की खींचतान के बीच राहुल गांधी प्रधानमंत्री की रेस में कैसे आगे बढ़ेंगे?
सवाल ये उठता है कि राहुल गांधी की प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश का आधार क्या है और उसके हकीकत में बदलने की कितनी गुंजाइश है? पीएम मोदी का जनाधार आज भी मजबूत बना हुआ है. मगर बीते एक साल में राहुल गांधी ने भी अपनी पकड़ बढ़ाई है. NEET/CBSE जैसे मुद्दों और बेरोजगारी के सवाल पर वो Gen-Z से लेकर युवाओं को जोड़ने की कोशिश में हैं. दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी तबका पहले से उनके साथ माना जाता है.
हाशिये पर राहुल गांधी को टक्कर देने वाले चेहरे
अगर चुनौतियों की बात करें तो INDIA गठबंधन में राहुल गांधी को टक्कर देने वाले चेहरे अब लगभग हाशिये पर हैं. शरद पवार की सियासी ताकत घटी है. ममता बनर्जी चुनावी झटके के बाद पार्टी बचाने में लगी हैं. वो सोनिया गांधी से गले मिलती दिखीं और अपने भतीजे को भी राहुल से मिलवाने भेजा. मुलायम सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं और अखिलेश यादव राहुल के साथ खड़े नजर आते हैं.
लालू यादव सेहत और कानूनी पचड़ों से कमजोर पड़े हैं. तेजस्वी भी राहुल की लीडरशिप को मान चुके हैं. यानी कभी चुनौती देने वाले दल अब 100 सांसदों वाली कांग्रेस और नेता विपक्ष के साथ दिख रहे हैं. स्टालिन भले INDIA गठबंधन से दूर हो गए हों लेकिन राहुल को पीएम फेस बनाने की मांग सबसे पहले उन्होंने ही उठाई थी. तमिलनाडु के सीएम और एक्टर विजय भी राहुल के साथ सहज दिखते हैं और खुलकर समर्थन करते हैं.
राहुल की कमान को लेकर अब कोई गंभीर सवाल नहीं
उद्धव ठाकरे भी राहुल की उम्मीदवारी के हक में दिखते हैं. कुल मिलाकर राहुल गांधी गठबंधन की बाहरी रुकावटों और नेतृत्व के विवाद से बाहर निकलते दिख रहे हैं. पार्टी के भीतर भी एक-दो अपवाद छोड़ दें तो कोई बड़ी बगावत नहीं है. सीनियर नेता अब उम्रदराज हो चुके हैं, G-23 खत्म हो चुका है. पार्टी में राहुल की कमान को लेकर अब कोई गंभीर सवाल नहीं बचा.
वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री कहते हैं, अगर क्षेत्रीय दलों का जनाधार कमजोर होता है तो कांग्रेस को राष्ट्रीय विपक्ष के तौर पर फायदा मिल सकता है, लेकिन यह पूरी तरह राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. ऐसे में राहुल के सामने सबसे बड़ा इम्तिहान है आम जनता से सीधा जुड़ाव बनाना और मोदी-जनता के बीच के मजबूत रिश्ते को कमजोर करना.
संस्थाओं का भरोसा जीतना भी जरूरी
साथ ही संस्थाओं से टकराव घटाकर उनका भरोसा जीतना भी जरूरी होगा. सैद्धांतिक लड़ाई अपनी जगह है, पर संस्थाओं के सहयोग के बिना 2029 की जंग आसान नहीं होगी. राहुल गांधी की राह में सबसे बड़ी दीवार पीएम मोदी ही हैं. बीजेपी का हिंदुत्व नैरेटिव और अल्पसंख्यकों पर उसका रुख भी राहुल के लिए मुश्किल खड़ी करता है. राहुल सेक्युलर और समावेशी सोच के साथ गांधीवादी रास्ते पर राजनीति कर रहे हैं. रास्ता मुश्किल और लंबा है. मगर राहुल अपनी जिद पर कायम हैं. न उन्हें सत्ता की जल्दबाजी है, न ही वो साम, दाम, दंड, भेद की सियासत करना चाहते हैं.

