Durvasa Rishi Sangameshwar Temple Pehowa: 88 हजार साल की तपस्या और ईंटों से बनते सपने, जानिए अरुणाय गांव के पावन धाम की महिमा
कुरुक्षेत्र के पिहोवा में स्थित संगमेश्वर महादेव व दुर्वासा ऋषि मंदिर में ईंटों से सपनों का घर, दुकान व वाहन बनाकर मन्नत मांगने की अनोखी परंपरा है।
कुरुक्षेत्र: कुरुक्षेत्र की पावन धरती प्राचीन काल से ही अध्यात्म, तपस्या और धार्मिक आस्था का केंद्र रही है. इसी जिले के पिहोवा उपमंडल के अरुणाय गांव में स्थित श्री दुर्वासा ऋषि एवं संगमेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनोखी मान्यता के कारण श्रद्धालुओं के बीच खास पहचान रखता है. यहां लोग केवल पूजा-अर्चना ही नहीं करते, बल्कि अपने सपनों के घर, दुकान, शोरूम और वाहन की इच्छा लेकर भी पहुंचते हैं.
ईंटों से बनाते हैं सपनों का छोटा आशियाना: मंदिर परिसर की सबसे खास बात यहां दिखाई देने वाले ईंटों के छोटे-छोटे ढांचे हैं. श्रद्धालु अपनी मनोकामना के अनुसार ईंटों से छोटा घर, दुकान, शोरूम या वाहन का प्रतीकात्मक ढांचा तैयार करते हैं. इसके बाद महर्षि दुर्वासा के सामने अपनी इच्छा पूरी होने की प्रार्थना करते हैं. श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस तरह प्रतीकात्मक रूप से बनाया गया आशियाना उनके वास्तविक सपने के पूरा होने का संकल्प होता है.
सरस्वती-अरुणा संगम पर तपस्या की मान्यता: अरुणाय गांव पवित्र सरस्वती और अरुणा नदियों के संगम क्षेत्र में स्थित है. मंदिर की पौराणिक मान्यता के अनुसार यह स्थान महर्षि दुर्वासा की साधना स्थली रहा है. मंदिर के मुख्य पुजारी यज्ञदत्त गौतम के अनुसार महर्षि दुर्वासा ने यहां भगवान शिव की कठोर तपस्या और महायज्ञ किया था. मान्यता है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा.
महादेव के बाद दुर्वासा ऋषि के दर्शन जरूरी: मंदिर के मुख्य पुजारी यज्ञदत्त गौतम ने ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान बताया कि, "मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार महर्षि दुर्वासा ने भगवान शिव से वर मांगा था कि संगमेश्वर महादेव के दर्शन करने वाले श्रद्धालु उनकी भी पूजा करें. तभी उनकी यात्रा पूर्ण मानी जाए.यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए संगमेश्वर महादेव के साथ महर्षि दुर्वासा के दर्शन का विशेष महत्व है. यही इस धाम की सबसे प्राचीन मान्यताओं में से एक है."
88 हजार वर्षों की तपस्या से जुड़ी मान्यता: मंदिर के इतिहास से जुड़ी मान्यता इसे सतयुग काल तक ले जाती है. कहा जाता है कि महर्षि दुर्वासा ने यहां 88 हजार वर्षों तक भगवान शिव की आराधना और महायज्ञ किया था. इस महायज्ञ की राख से लगभग 50 फीट ऊंचा टीला बनने की भी मान्यता है, जिस पर वर्तमान में अरुणाय गांव बसा हुआ है. ग्रामीणों के बीच यह विश्वास आज भी कायम है कि जमीन की खुदाई करने पर कई स्थानों से भस्म मिलती है.
कच्चे मकान से पक्के घर की आस: इस मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं में सबसे प्रमुख इच्छा अपने घर की होती है. इस्माइलाबाद से आने वाली सुरेशो देवी भी इसी उम्मीद के साथ यहां पहुंचीं. उनका परिवार कच्चे मकान को पक्का बनाने की इच्छा रखता है. वह बताती हैं कि, "हमने बाबा के दरबार में ईंटों से छोटा घर बनाया है. हमारी इच्छा है कि परिवार का अपना पक्का मकान हो और इसी विश्वास के साथ यहां मन्नत मांगी है."
दुकान और शोरूम का सपना भी लेकर पहुंचते हैं लोग: अरुणाय में केवल घर की चाह लेकर ही श्रद्धालु नहीं आते. कई लोग कारोबार के लिए दुकान, शोरूम या फैक्ट्री की इच्छा लेकर भी यहां ईंटों का प्रतीकात्मक ढांचा बनाते हैं. कैथल से पहुंचे अजय ने भी अपनी दुकान और शोरूम की मनोकामना लेकर मंदिर में पूजा की. उनका कहना है कि, "हमने यहां अपनी इच्छा के अनुसार ईंटों का छोटा ढांचा बनाया है. विश्वास है कि महर्षि दुर्वासा की कृपा से कारोबार का सपना पूरा होगा."
बड़े घर और गाड़ी की भी मांग: श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं में बड़े घर के साथ वाहन की इच्छा भी शामिल है. कमल और विकास राणा जैसे श्रद्धालु भी ईंटों से अपने सपनों का प्रतीक बनाकर यहां प्रार्थना करते हैं. श्रद्धालु कमल कहते हैं कि, "यहां आकर मन को अलग तरह की शांति मिलती है. अपनी इच्छा को ईंटों के रूप में बनाकर बाबा के चरणों में समर्पित करने की परंपरा हमें बहुत खास लगती है." वहीं, श्रद्धालु विकास राणा ने ईटीवी भारत से बातचीत में कहा कि, "लोग अपनी क्षमता और इच्छा के हिसाब से ईंटों का छोटा घर या दूसरी चीजों का प्रतीक बनाते हैं. हमारी भी इच्छा है कि भविष्य में अपना बड़ा घर और वाहन हो. इसी विश्वास के साथ यहां आए हैं. इस परंपरा में श्रद्धालुओं की भावनाएं जुड़ी हैं और लोग मनोकामना पूरी होने के बाद दोबारा दर्शन के लिए आते हैं."
हरियाणा ही नहीं, दूसरे राज्यों से भी आते हैं श्रद्धालु: खास बात यह है कि अरुणाय का यह मंदिर स्थानीय लोगों के साथ-साथ पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और चंडीगढ़ समेत कई क्षेत्रों के श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. मंदिर में आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना के अनुरूप ईंटों से प्रतीकात्मक ढांचा बनाते हैं. गुरदीप भी इसी परंपरा के तहत मंदिर पहुंचे. उन्होंने कहा कि, "यहां आकर अपनी इच्छा को इस तरह ईंटों से बनाना एक अलग अनुभव है. मन में विश्वास रहता है कि बाबा हमारी प्रार्थना जरूर सुनेंगे."
मंदिर परिसर में दिखते हैं सपनों के छोटे-छोटे मॉडल: मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही ईंटों से बने छोटे-छोटे घर, दुकानें और वाहनों के प्रतीक दिखाई देते हैं. पहली नजर में ये ढांचे सामान्य लग सकते हैं, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए इनके पीछे उनकी जिंदगी से जुड़े बड़े सपने होते हैं. किसी के लिए यह पक्का मकान है तो किसी के लिए रोजगार और कारोबार का नया ठिकाना. यही दृश्य इस मंदिर की परंपरा को दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग बनाता है.
मनोकामना पूरी होने पर दोबारा आते हैं श्रद्धालु: श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने के बाद वे दोबारा मंदिर पहुंचकर महर्षि दुर्वासा का आभार व्यक्त करते हैं. इस विश्वास ने अरुणाय को आस्था के ऐसे केंद्र के रूप में पहचान दी है, जहां लोग अपनी इच्छाओं को केवल शब्दों में नहीं बल्कि ईंटों के छोटे-से प्रतीक के रूप में भी व्यक्त करते हैं. मंदिर के मुख्य पुजारी यज्ञदत्त गौतम कहते हैं कि, "श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां आते हैं. उनकी भावनाएं ही इस परंपरा की सबसे बड़ी ताकत हैं."
कुरुक्षेत्र आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए अरुणाय का यह मंदिर एक अलग अनुभव दे सकता है. ज्योतिसर और ब्रह्मसरोवर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों के साथ पिहोवा के निकट स्थित अरुणाय में सरस्वती-अरुणा संगम, प्राचीन मान्यताएं और ईंटों से जुड़े श्रद्धा के प्रतीक देखने को मिलते हैं. यहां बने छोटे-छोटे आशियाने उन बड़े सपनों की कहानी कहते हैं, जिन्हें श्रद्धालु आस्था के सहारे पूरा होते देखना चाहते हैं

