श्रीकृष्ण अपने मुकुट में क्यों लगाते थे मोर पंख? जानें पौराणिक कथा

भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट पर मोर पंख होने के पीछे सिर्फ राधा प्रेम ही नहीं, बल्कि त्रेतायुग के भगवान राम से जुड़ी एक खास पौराणिक कथा भी है। पढ़ें पूरी कहानी।

 
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 द्वापरयुग में जगत के पालनहार भगवन श्री हरि विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अपना आठवां अवतार लिया था. भगवान श्रीकृष्ण सिर पर मुकुट, उसमें लगा मोर पंख, हाथों में बांसुरी और पीतांबर धारण करते हुए ही ज्यादातर प्रतिमाओं और तस्वीरों में नजर आते हैं. उनका ये रूप भक्तों को बहुत आकर्षित करता है. भक्तों ने भगवान के इस रूप को अपने ह्रदय में विशेष स्थान दिया है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मुकुट में मोर के पंख को ही क्यों स्थान दिया?

इसके पीछे का कारण श्रीकृष्ण का राधारानी के प्रति अटूट प्रेम बताया जाता है, लेकिन भगवान के मोर का पंख धारण करने के पीछे त्रेता युग यानी भगवान श्री राम के युग की भी एक कहानी है. आइए विस्तार से जानते हैं.

ब्रज की मान्यताओं के अनुसार…

ब्रज की मान्यताओं के अनुसार, मोर का पंख भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के दिव्य प्रेम का प्रतीक है. इसमें प्रेम, समर्पण और पवित्रता का भाव है. यही कारण है कि जन्माष्टमी और भगवान श्रीकृष्ण के अन्य त्योहारों में मोर के पंख का विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घर के मंदिर या पूजा स्थान में मोर का पंख रखना शुभ होता है. इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मकता नहीं आती है.

पौराणिक कथा के अनुसार…

मोर के पंख का संबंध भगवान विष्णु के श्रीराम अवतार से भी है.पौराणिक कथा के अनुसार, वनवास के दौरान सीता हरण के बाद भगवान श्री व्याकूलता से प्रकृति और पशु पक्षियों सबसे माता सीता का पता पूछते हैं. तब एक मोर उनसे कहा कि उसने देखा है कि रावण किस ओर माता सीता को लेकर गया है. मोर ने भगवान से कहा कि वो उनको वो रास्ता दिखा सकता है, जिससे रावण माता सीता को लेकर गया, लेकिन मोर ने प्रभु से कहा कि वो तो उड़ेगा और जगत के नाथ पैदल चलेंगे.

श्रीराम मोर की भक्ति से प्रसन्न हुए

उस स्थिति में मोर ने प्रभु राम को एक उपाय बताया. उसने कहा कि वो उड़ते हुए अपने पंख जमीन पर गिराता हुआ चलेगा, जिससे श्रीराम रास्ता न भटकें. इसके बाद मोर आकाश मार्ग से उड़ते हुए बीच-बीच में अपना एक पंख गिराने लगा. ताकि श्रीराम और लक्ष्मण रास्ता न भटकें. मोर के पंख गिराने से उसके पास पंख नहीं बचे और उसकी मृत्यु निकट आ गई. भगवान ने जब देखा कि मोर उनकी सेवा में प्राण त्यागने तक को आतुर है, तो वो उसकी भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए.

श्रीराम ने कहा कि वो इस जन्म में मोर के उपकार का मूल्य नहीं चुका सकते, लेकिन अपने अगले जन्म मोर के सम्मान के लिए उसके पंख को मुकुट पर अवश्य धारण करेंगे. जब अगले जन्म में भगवान श्रीकृष्ण के रूप में धरती पर आए तो उन्होंने मोर के पंख को अपने मुकुट पर धारण किया.