सत्संग वो है जो हमारे मन वचन कर्म को सुधारे-परमसंत सतगुरु कंवर साहेब जी महाराज

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भिवानी ।

 सत्संग केवल प्रवचन करना या सुनना नहीं है।सत्संग वो है जो हमारे मन वचन कर्म को सुधारे।संतो की बानी सुनना,संतो के वचन पढ़ना, संतो के वचनों का चिंतन मनन करना भी सत्संग है।जो सेवा करना जानता है वो सत्संग को भी समझता है।सेवा आपको परमात्मा के अंग संग करती है।सेवा आपको समभाव कराती है।सेवा से संतोष धैर्य प्रेम दया जैसे गुण उपजते हैं।यह सत्संग वचन परमसंत सतगुरु कंवर साहेब जी महाराज ने दिनोद गांव में फरमाए।हुजूर महाराज अपने गुरु परमसंत ताराचंद जी महाराज के अवतरण दिवस पर 25 सितंबर को होने वाले सत्संग की सेवाकार्यो के लिए उपस्थित सेवादारों को सत्संग फरमा रहे थे।कंवर साहेब ने फरमाया कि संत तो सदा सत्संग में ही रहते हैं। संत सदैव सत्पुरुष का संग करते हैं।
दुनियादारी में हमारे पास सब कुछ होते हुए भी हमारा कुछ नहीं है।दुनिया में अगर कोई हमारा है तो केवल सतगुरु है क्योंकि केवल सतगुरु और सत्संग ही विपत में हमारे काम आते हैं।सत्संग हमें हमारा आपा जनाता है और जिसने आपा जान लिया उसने परमात्मा को पा लिया।उन्होंने अपने गुरु को स्मरण करते हुए फरमाया कि मैंने तो अपने गुरु के रूप में साक्षात परमात्मा का संग किया है।आज भी वो हाजिर नाजिर हो कर मेरे सारे काम करते हैं।उन्होंने कहा कि संतो का ज्ञान आंख में सुरमा डालने जैसा है जो आंखो पर पड़े जाले को साफ कर देता है।जीवन के महत्व को जानो।सत्संग जीवन के महत्व को जनाता है।सत्संग ऐसी हाट है जहां सच्चा सौदा मिलता है।हुजूर महाराज जी ने कहा कि महापुरुषो की शिक्षाएं हमें जीवन में दिशाएं दिखाती हैं।

कुल मालिक अवतार ताराचंद जी महाराज का जीवन ऐसा अलौकिक था जिसको जानकर आने वाली पीढ़ियां चमत्कृत होंगी कि साक्षात परमात्मा इस धरा पर अवतरित हुआ था।हुजूर महाराज जी ने कहा कि ताराचंद जी सेवा को।सबसे बड़ी बताया करते लेकिन सेवा केवल सतगुरु की दरबार की ही नहीं होती है और ना ही सेवा का कोई एक रूप है।सेवा तो तन मन धन से अनेकों रूप से की जा सकती है।सेवा मातृभक्ति, पितृभक्ति, देशभक्ति के रूप में भी करते हैं,सेवा दिन दुखी की और जरूरतमंद की भी होती है लेकिन सबसे उत्तम सेवा सुरत की सेवा है सत्संग की सेवा है क्योंकि किसी और सेवा में तो कुछ ना कुछ स्वार्थ हो सकता है लेकिन सुरत की सेवा निस्वार्थ सेवा होती है।सेवा हृदय को पवित्र बनाती है और पवित्र हृदय से ही भक्ति संभव है।उन्होंने कहा कि सतगुरु की ओट में आने से तो कोटि पाप भी कट जाते हैं।सतगुरु आपको नाम रूपी वो अमरजडी देता है जिसके सेवन से जन्म जन्मांतर की व्याधियां कट जाती हैं।गुरु महाराज ने फरमाया कि शिष्य होने का धर्म को समझो।हम कहने को तो शिष्य हैं पर क्या हमने अपना शीश अर्पण किया।शीश का अर्थ सिर से नहीं है अभिमान से है।शिष्य हुए हो तो अभिमान भी मारना सीखो।भक्ति का यही सिद्धांत है की पहले अपनी दृष्टि का दोष हटाओ मन के दोष स्वत हट जाएंगे।

जब हम दूसरो के दोष देखते हैं तो हम स्वयं भी भी उन दोषों में अपना मन दे रहे हैं।भक्ति के तरीके और पद्धतियां भले ही अलग अलग हो सकती हैं लेकिन उनका मूल तत्व एक ही है और वो है मन की सचाई और पवित्रता।कहने को तो हम कह देते हैं की हमने अपना मन सतगुरु को सौंप दिया लेकिन क्या वास्तव में सौंपा क्या।मन गुरु को दे ही दिया तो उसमें हम अपने ख्याल और आकांक्षा क्यों रखे।मन गुरु को दिया है तो ख्याल और विचार भी उसमें गुरु के ही रखो।उन्होंने सेवादारों को कल के सत्संग के लिए होशियारी से सेवा कार्य करने के निर्देश दिए।उल्लेखनीय है कि हर वर्ष दिनोद गांव में परमसंत ताराचंद जी महाराज का जन्मदिवस के मौके पर सत्संग और भंडारे का आयोजन किया जाता है।इस अवसर पर रक्तदान शिविर भी लगाया जाएगा।

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