सेवा, सदाचार और सत्संग से ही सार्थक होता है मानव जीवन : परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज
दिनोद धाम राधास्वामी आश्रम में गुरु पूर्णिमा महोत्सव की तैयारियों के बीच सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज ने सेवा, भक्ति और सत्संग पर प्रेरणादायी विचार व्यक्त किए।
दिनोद, 28 जुलाई। आगामी गुरु पूर्णिमा महोत्सव की तैयारियों में जुटे सैकड़ों सेवादारों को संबोधित करते हुए दिनोद धाम स्थित राधास्वामी आश्रम में परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज ने सेवा, भक्ति, सत्संग, कर्म और मानव जीवन के उद्देश्य पर प्रेरणादायी विचार व्यक्त किए।गुरु महाराज ने कहा कि सेवा भक्ति का सर्वोत्तम स्वरूप है। निस्वार्थ भाव से परमार्थ वही व्यक्ति कर सकता है जो अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करता हो। पहले स्वयं को पात्र बनाना आवश्यक है, क्योंकि बिना पात्रता के कुछ भी प्राप्त नहीं होता। संतमत मनुष्य के भ्रम दूर कर उसे सेवा, सदाचार और परमात्मा के सच्चे मार्ग पर चलना सिखाता है। जैसे सुनार खोटे सोने को भी संभालकर उसका सदुपयोग करता है, उसी प्रकार संत किसी जीव की उपेक्षा नहीं करते, बल्कि सभी को उनके भाव और पात्रता के अनुसार आध्यात्मिक उन्नति का अवसर देते हैं।उन्होंने कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य अपने अंतर में झांककर परमात्मा की खोज करना है। प्रत्येक श्वास अनमोल है और प्रभु-भजन के बिना बीतने वाला जीवन व्यर्थ है। कर्म का सिद्धांत अटल है—जो बोओगे वही काटोगे। इसलिए किसी को कष्ट न दें, क्योंकि जो पीड़ा हमें होती है, वही दूसरे को भी होती है। प्रभु के दरबार में न छल चलता है, न रिश्वत और न ही कोई चतुराई।सत्संग की महिमा बताते हुए गुरु महाराज ने कहा कि जहाँ सत्संग होता है वहीं परमात्मा का निवास होता है, लेकिन सत्संग केवल कानों से नहीं बल्कि हृदय से ग्रहण करना चाहिए। संत अनुभव के भंडार हैं और उनकी संगति मनुष्य के जीवन को नई दिशा देती है। सच्ची लगन केवल परमात्मा से लग सकती है और गुरु का वचन सभी मंत्रों का सार है।
पलटू साहब का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि कैसे भगवान ने स्वयं उन्हें अपनी भूल का बोध कराया और उसी घटना ने उनके जीवन को भक्ति की ओर मोड़ दिया। उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में भी परमात्मा अनेक अवसर प्रदान करता है, लेकिन संकीर्ण सोच के कारण हम उन्हें पहचान नहीं पाते। मन निर्मल होगा तो परमात्मा कभी दूर नहीं रहेगा।
सेवादारों को प्रेरित करते हुए गुरु महाराज ने एक सुंदर उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब एक कौआ बाज को बार-बार परेशान करने लगा तो बाज ने उससे उलझने के बजाय अपनी उड़ान और ऊँची कर ली। ऊँचाई बढ़ते ही कौआ स्वयं पीछे छूट गया। इसी प्रकार संसार रूपी कौओं की आलोचनाओं और बाधाओं में उलझने के बजाय अपने कर्म, चरित्र और साधना की उड़ान इतनी ऊँची कर लो कि नकारात्मकता स्वयं आपका पीछा छोड़ दे।
महाभारत के संजय और धृतराष्ट्र के संवाद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल विज्ञान नहीं बल्कि आध्यात्मिक शक्ति और परा विद्या का उदाहरण है। जब मन की वृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं तो असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी संभव हो जाते हैं। समय की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि विवेकवान व्यक्ति समय की चाल को पहले ही पहचान लेता है।
गुरु महाराज ने सेवादारों को सावधानी का संदेश देते हुए कहा कि सेवा पूरे समर्पण से करें, लेकिन आसपास के वातावरण के प्रति भी सदैव सजग रहें, क्योंकि “सावधानी में ही बचाव है।” सही मार्ग का चयन ही सफलता की आधी जीत है।अपने सत्संग के समापन में उन्होंने कहा कि भक्ति किसी लेन-देन का विषय नहीं, बल्कि शुद्ध भावना और दृढ़ लगन का नाम है। केवल ग्रंथों का अध्ययन पर्याप्त नहीं, बल्कि प्रभु-नाम को जीवन में उतारना आवश्यक है। मरना आसान है, किंतु मानव जीवन के सभी दायित्व निभाते हुए सत्कर्मों से अमर बनना कठिन है। संत इसी कठिन मार्ग को सरल बनाकर मनुष्य को जीवन के वास्तविक आनंद और परमात्मा की ओर अग्रसर करते हैं।

