Rabi ul Awal 2026 Date: रबीउल अव्वल का महीना क्यों है खास? जानें पैगंबर मोहम्मद के जन्म और वफात की तारीख
रबीउल अव्वल इस्लामिक कैलेंडर का तीसरा महीना है, जो सफर के महीने के बाद आता है. जिस तरह इस्लाम में रमजान का महीने सबसे पाक माना जाता है. ठीक उसी तरह, रबीउल अव्वल महीने को भी खास अहमियत दी गई है और इसके पीछे एक खास वजह जुड़ी है. इस महीने को बड़ा मुबारक महीना करार दिया गया है, क्योंकि इसमें इस्लाम के आखिरी पैगंबर मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था. रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख को मुहम्मद साहब दुनिया में आए थे. लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि 12 रबीउल अव्वल को ही उनका जन्म हुआ और इसी दिन लगभग 62-63 साल की उम्र में उनकी वफात (मौत) हुई थी.
हर साल ईद-ए-मिलाद उन नबी रबीउल-अव्वल की 12वीं तारीख को मनाई जाती है, जो इस साल 26 अगस्त 2026 को है. इसे मौलिद, मिलादुन्नबी और 12 वफात भी कहते हैं. इस ईद को कुछ मुसलमान त्योहार की तरह धूमधाम से मनाते हैं, जबकि कुछ लोग मिलाद उन नबी को त्योहार की तरह मनाना ठीक नहीं समझते हैं. इसे लेकर मुस्लिम समाज में अलग-अलग मत मिलते हैं. आइए जानते हैं कि ईद-ए-मिलाद उन नबी पर जश्न मनाना इस्लाम में जायज है या नहीं.
ईद-ए-मिलाद उन नबी का मतलब
ईद-ए-मिलाद उन नबी के बारे में जानने से पहले हम जान लेते हैं कि इसका मतलब क्या है. ईद-ए-मिलाद उन नबी तीन शब्दों से मिलकर बना है. पहला लफ्ज ईद का मतलब है लौटकर आने वाली खुशी. दूसरा लफ्ज मिलाद का मतलब है पैदाइश और तीसरा लफ्ज नबी है जिसका मतलब पैगंबर मुहम्मद साहब हैं. ऐसे में इन तीनों लफ्जों को एक साथ मिलाकर देखा जाए तो इसका मतलब होता है नबी की पैदाइश की खुशी. चूंकि इस दिन मुहम्मद साहब की पैदाइश हुई, इसलिए इसे ईद-ए-मिलाद उन नबी नाम दिया गया.
इस दिन को मनाना कैसा है?
कुछ मुसलमान इस दिन अपने घर पर झंडे लगाते हैं, जुलूस निकालते हैं, डीजे बजाते हैं, घरों को लाइट से रौशन करते हैं, कहीं-कहीं भी मेला लगता है, घर में सजावट की जाती है, आतिशबाजी करना और तरह-तरह के खाने बनाना जैसी चीजें रस्म के तौर पर करते हैं. लेकिन कुरान की सबसे पाक किताब कुरान में कहीं भी इस नाम से कोई त्योहार मनाने की हुक्म नहीं मिलता है. साथ ही, इस दिन जुलूस निकालना, जश्न मनाना या रोजा रखने को लेकर भी कुरान-हदीस में जिक्र नहीं किया गया है.
इन सबके अलावा, कुश मुसलमान ईद-ए-मिलाद उन नबी को नहीं मनाते हैं. बल्कि इस दिन जश्न मनाने के बजाय दुरूद पढ़ते हैं, नात सुनते हैं और पैगंबर मुहम्मद साहब की सुन्नतों को याद करते हैं. 12 रबीउल अव्वल खुशी और गम दोनों का दिन है इसलिए इस दिन बहुत गम करना या खुशी मनाना इस्लामिक नजरिए से सही नहीं है.
12 रबीउल अव्वल पर क्या करें?
ऐसे में मुसलमानों को चाहिए कि वो इस दिन नबी की सीरत पढ़ें, दुरूद-ओ-सलाम पढ़ें, अपनी नमाज और इबादत पर ध्यान दें, नबी के अखलाक को समझें, वालिदैन और घरवालों के साथ अच्छा सुलूक करें, गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद करें और नबी की सुन्नत को अपनी जिंदगी में अपनाने की कोशिश करें. साथ ही, अपना ज्यादातर दिन मुहम्मद साहब की इबादत में गुजारें. अगर कोई मुसलमान चाहे तो इस दिन सुन्नत रोजा रख सकता है और अगर न भी रखे तो कोई मसला नहीं.