जनसंघर्ष समिति ने महात्मा गांधी की 157वीं व लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती मनाई
भिवानी :
जनसंघर्ष समिति भिवानी ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 157वीं तथा पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती इस दृढ़ संकल्प के साथ मनाई कि उनकी शानदार विरासत को कायम रखते हुए आगे बढ़ाने का संकल्प पूरा किया जाए। समिति के कार्यकर्ताओं ने प्रात: काल पंडित नेकीराम शर्मा लाईब्रेरी जाकर गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।
कार्यकम की अध्यक्षता समिति के जिला सचिव सज्जन कुमार सिंगला व किसान सभा ब्लाक प्रधान सन्तोष देशवाल ने संयुक्त रूप से की।
इस अवसर पर जनसंघर्ष समिति के संयोजक व माकपा नेता कामरेड ओमप्रकाश, युवा कल्याण संगठन के संरक्षक कमल प्रधान, दलित अधिकार मंच के जिला संयोजक सुखदेव पालवास व जनवादी महिला समिति की जिला प्रधान बिमला घनघस ने कहा कि इस समय हमारे देश के चौतरफा हालात दुर्भाग्य पूर्ण रूप से गुजर रहे है।
हमारे देश की आजादी आंदोलन के नेताओं व उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने की बजाए हमारे देश की सरकार सबकी सरकार बनने की बजाए वह केवल आरएसएस की सरकार बनी हुई है, उसने भारतीय संविधान का अपमान करके आर एस एस के नाम डाक टिकट जारी किया है और आरएसएस की स्थापना की 100वीं वर्षगांठ मनाने के लिए 100 रुपये का सिक्का जारी करना भारत के उस संविधान, जिसे आरएसएस ने कभी स्वीकार नहीं किया का घोर अपमान और उस पर हमला है।
यह बेहद आपत्तिजनक है कि एक आधिकारिक सिक्के पर एक हिंदू देवी भारत माता की छवि अंकित हो, जिसे आरएसएस ने हिंदुत्ववादी राष्ट्र की अपनी सांप्रदायिक अवधारणा के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया है।
1963 के गणतंत्र दिवस परेड में वर्दीधारी आरएसएस स्वयंसेवकों को दर्शाने वाला डाक टिकट भी इतिहास को गलत साबित करता है। यह इस झूठ पर आधारित है कि नेहरू ने भारत-चीन युद्ध के दौरान आरएसएस को उसकी देशभक्ति की मान्यता के रूप में 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था, जबकि साक्ष्यों से यह साबित हो चुका है कि 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में मूलत: एक लाख से ज़्यादा नागरिकों का एक विशाल जमावड़ा था। अगर आरएसएस के वर्दीधारी स्वयंसेवकों की उपस्थिति थी भी, तो वह अघोषित और आकस्मिक थी।
यह पूरी कवायद आरएसएस की शर्मनाक भूमिका को छिपाने के लिए है, जो न केवल स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहा, बल्कि उसने वास्तव में फूट डालो और राज करो की ब्रिटिश रणनीति को मज़बूत किया। इस प्रकार आरएसएस ने भारत के लोगों की उस एकता को कमज़ोर करने की कोशिश की, जो औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष का एक महत्वपूर्ण घटक थी।
स्वतंत्र भारत के इतिहास ने सबसे भयावह सांप्रदायिक हिंसा देखी है, जिसमें आरएसएस की भूमिका का विस्तृत विवरण आधिकारिक जांच आयोगों की कई रिपोर्टों में दिया गया है। आज आरएसएस और उसका परिवार ही मनुवादी विचारधाराओं को बढ़ावा देकर अल्पसंख्यक समुदायों और समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों को निशाना बना रहा है। आरएसएस के इतिहास की यही सच्चाई है जिसे प्रधानमंत्री अपने पद का दुरुपयोग करके छुपाना चाहते हैं। ऐसा करके उन्होंने अपने संवैधानिक पद की गरिमा को कम किया है।
उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं की विरासत को खत्म करना चाहती है और आर एस एस की विचार धारा को लागू करके एक धर्म आधारित राष्ट्र बनाना चाहती है। इसे भारत की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी।
इस अवसर पर सीटू जिला सचिव कामरेड अनिल कुमार, रिटायर्ड कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष मास्टर वजीर सिंह, महासचिव रतन कुमार जिंदल, जिला प्रधान नरेश कुमार शर्मा, किसान सभा के जिला प्रधान रामफल देशवाल, ब्लाक सचिव करतार सिंह ग्रेवाल, प्रताप सिंह सिंहमार, महाबीर फौजी, महेद्र सिंह प्रजापति, मजदूर नेता अमीर सिंह, राजाराम, मास्टर चांदीराम, युवा नेता प्रवीन प्रजापति, महिला नेत्री अनुराधा शामिल रहे।

