Shri Krishna Janmashtami 2026: सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहना ही जन्माष्टमी का असली संदेश - परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज
सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहना ही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का संदेश : परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज
दिनोद।।04.09.2026।। “जाको राखे साइयां, मार सके ना कोय”—श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व हमें यही संदेश देता है कि अंततः वही होता है, जो परमात्मा की इच्छा होती है। अधर्म कुछ समय के लिए धर्म को विचलित अवश्य कर सकता है, लेकिन जो सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ता, विजय अंततः उसी की होती है। यह उद्गार परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज ने दिनोद गांव स्थित राधास्वामी आश्रम में साध संगत के समक्ष सत्संग फरमाते हुए व्यक्त किए।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं देते हुए हुजूर कँवर साहेब जी महाराज ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निकला गीता का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गीता हमें उन मोह-ममताओं और सांसारिक बंधनों से ऊपर उठने की प्रेरणा देती है, जो जीव को भक्ति और सत्य के मार्ग से विचलित करते हैं। उन्होंने कहा कि आत्मा अजर-अमर है, आत्मा कभी नहीं मरती, केवल शरीर नश्वर है। आवश्यकता इस बात की है कि मन की बेड़ियों से मुक्त हुआ जाए, क्योंकि यही मन जीव को सत्य से भटकाकर काल के जाल में उलझाता है।गुरु महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और कंस मर्दन का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि कंस को आकाशवाणी द्वारा चेतावनी मिली थी कि देवकी की आठवीं संतान ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। इसके बाद भयभीत कंस ने देवकी की सात संतानों को एक-एक कर मार डाला, लेकिन नियति को कोई नहीं टाल सका और आठवीं संतान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, जिन्होंने अंततः कंस का वध कर अधर्म का अंत किया।हुजूर कँवर साहेब जी महाराज ने कहा कि सदियों से मनुष्य यही करता आया है—संतों के संदेश और उपदेश सुनता है, लेकिन उन्हें अपने जीवन में उतार नहीं पाता। इंसानी चोले का वास्तविक अर्थ ही यही है कि मनुष्य धर्ममार्गी बने, जरूरतमंद की सहायता करे, प्रभु को पाने की चेष्टा करे और अपने कर्मों को निष्काम भाव से करता रहे। पुण्य कमाए, संत-महात्माओं की संगति करे और अपने भीतर प्रेम, दया तथा करुणा का भाव विकसित करे।उन्होंने कहा कि केवल बाहरी आडंबर और दिखावे की भक्ति से आत्मिक कल्याण संभव नहीं है। वर्षों तक पाप कर्म करने के बाद केवल एक दिन गंगा स्नान कर लेने से मन निर्मल नहीं हो जाता। मन में कपट और छल रखते हुए नाम-सुमिरन का ढोंग भी जीव को मुक्ति नहीं दे सकता। इस जगत में वास्तविक कल्याण तभी संभव है, जब मनुष्य के भीतर कल्याण भावना जागृत हो।

गुरु महाराज ने कहा कि सोते-जागते, उठते-बैठते अपने धनी को याद रखना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अनेक लीलाओं और जीवन प्रसंगों के माध्यम से जीव को चेताया तथा अलग-अलग तरीकों से कर्म, धर्म और कर्तव्य का बोध कराया। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम उस योगी पुरुष की शिक्षाओं को सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने आचरण का हिस्सा बनाएं।उन्होंने कहा कि सत्संग हमें प्रतिदिन यही शिक्षा देता है कि काल के जाल से जूझते हुए अपनी मर्यादा और धर्म पर अडिग रहो तथा सत्य का साथ कभी मत छोड़ो, क्योंकि सत्य ही परमात्मा है। जीवन की सार्थकता बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि सत्य, धर्म, सेवा, सुमिरन और सद्भाव से निर्मित उस जीवन में है, जो स्वयं के साथ-साथ समाज के कल्याण का कारण बने।हुजूर कंवर साहेब ने अध्यात्म के साथ साथ सामाजिकता का संदेश देते हुए फ़रमाया कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल उत्सव मनाने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर के अधर्म, अहंकार, छल और द्वेष को समाप्त करने का संकल्प लेने का अवसर है। आइए, इस पावन अवसर पर हम सत्य और धर्म का साथ देने, जरूरतमंद की सहायता करने, आपसी प्रेम एवं भाईचारा बढ़ाने और समाज में शांति, सद्भाव तथा मानवता की भावना को मजबूत करने का संकल्प लें।